यथार्थ की आराधना के समान कोई तप नहीं : महातपस्वी महाश्रमण


लाडनूं : राजस्थान राज्य के डीडवाना-कुचामन जिले में स्थित लाडनूं नगर मानों तीर्थस्थल-सा बना हुआ है। देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु लाडनूं पहुंच रहे हैं। श्रद्धालुओं के अवागमन के कारण पूरा लाडनूं नगर गुलजार बना हुआ है। वहीं लाडनूं नगर में स्थित जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी योगक्षेम वर्ष सुसम्पन्न कर रहे हैं। इस कारण जैन विश्व भारती परिसर में तो मानों मेले जैसा दृश्य दिखाई देता है। हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति, चार सौ से भी अधिक साधु-साध्वियों की उपस्थिति, बड़ी संख्या में उपस्थित समणीवृंद, मुमुक्षुओं की उपस्थिति से श्रद्धालुओं को विशेष धार्मिक-आध्यात्मिक उपासना का लाभ प्राप्त हो रहा है। नित्य प्रति युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री चतुर्विध धर्मसंघ को निर्धारित विषयों को आगमों के आधार पर व्याख्यायित करते हैं। यह प्रवचन का समय सभी के लिए विशेष ज्ञान के ग्रहण का मानों माध्यम बन गया है। इसके साथ ही चारित्रात्माओं द्वारा की जाने वाली जिज्ञासाओं और आचार्यश्री द्वारा प्रदत्त उत्तर भी कितने-कितने श्रद्धालुओं के शंकाओं का भी समाधान करने वाले सिद्ध हो रहे हैं। इस कारण पूरे लाडनूं नगर माहौल अध्यात्ममय बना हुआ है।

सोमवार को नित्य की भांति प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘हित और सत्य बोलो’ को विवेचित करते हुए कहा कि साधु का दूसरा महाव्रत सर्व मृषावाद विरमण होता है। पांच महाव्रतों की पालना कितने बड़े जिम्मेदारी का कार्य होता है। इनका जीवन भर पालन करना किसी के लिए थोड़ा कठिन हो सकता है तो वहीं इनके प्रति विशेष श्रद्धा व आस्था रखने वालों के लिए बड़ा ही सहज भी हो सकता है। दूसरे महाव्रत के संदर्भ में बताया गया कि हमेशा अप्रमत्त रहते हुए मृषावाद का पालन करने का प्रयास करना चाहिए। साधु को तो यह विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए कि कहीं उसके मुंह से अयथार्थ बात न निकल जाए।

एक ओर प्रलोभन हो और दूसरी ओर मृषावाद विरमण का महाव्रत हो तो साधु की भावना इतनी पुष्ट हो कि कोई भी प्रलोभन साधु को लुभा न सके। उसके मन में ऐसी भावना हो कि मेरे महाव्रतों के सामने करोड़ों की सम्पत्ति भी नाकुछ के समान है। इस प्रकार नित्य प्रति अप्रमत्त रहते हुए मृषावाद का विवर्जन करना चाहिए। मृषावाद नहीं करना संवर है। हितकारी सत्य बोलने का प्रयास करना चाहिए।

जीवन में कई बार कठिनाई भी आ जाए और आदर्श की बात तो इतनी हो कि साधु गला कटवाना मंजूर कर ले, किन्तु झूठ बोलना स्वीकार नहीं। साधु के तीन करण, तीन योग से मृषावाद का त्याग होता है। प्राण की परवाह किए बिना मृषावाद का त्याग करने का प्रयास करना चाहिए।

यथार्थ की आराधना के समान कोई तप नहीं है। सच्चाई के लिए सरलता, अभय, निर्लोभता और गंभीरता भी अपेक्षित है। सच्चाई की दृष्टि से अल्पभाषी होना भी साहयक बनता है। सभी को अपनी वाणी पर नियंत्रण रखने का प्रयास करना चाहिए। जहां तक संभव हो अयथार्थ बोलने से बचने का प्रयास करना चाहिए।

आज आचार्यश्री के मुखारविंद के लुंचन के संदर्भ में चतुर्विध धर्मसंघ ने आचार्यश्री को सविधि वंदन करते हुए लुंचन की निर्जरा में सहभागी बनाने की प्रार्थना की तो आचार्यश्री ने साधु, साध्वियों व समणियों आधा-आधा घण्टा आगम स्वाध्याय, मुमुक्षुओं के लिए आधे घंटे का कुछ भी स्वाध्याय तथा श्रावक-श्राविकाओं को तीन-तीन अतिरिक्त सामायिक एक सप्ताह में पूर्ण करने की प्रेरणा प्रदान की।

कार्यक्रम के दौरान आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में साध्वी आशावतीजी की स्मृतिसभा का आयोजन किया गया। आचार्यश्री ने उनका संक्षिप्त जीवन परिचय प्रदान करते हुए उनकी आत्मा के प्रति मध्यस्थ भाव व्यक्त करते हुए चतुर्विध धर्मसंघ के साथ चार लोगस्स का ध्यान किया। उनके संदर्भ में साध्वीप्रमुखाजी विश्रुतविभाजी, मुख्यमुनि महावीरकुमारजी, शासन गौरव साध्वी राजीमतीजी, साध्वी विशदप्रभाजी, साध्वी जिनप्रभाजी, साध्वी प्रांजलप्रभाजी, साध्वी जागृतयशाजी, मुनि कमलकुमारजी ने भी उनके प्रति अपनी मध्यस्थ भावना अभिव्यक्त की। उनके संसारपक्षीय परिवार की ओर से श्रीमती हर्षा मरोठी, श्री निर्मल भूरा, सुश्री ईशा बैद, श्री हंशराज भूरा व तेरापंथी सभा-गंगाशहर के अध्यक्ष श्री नवरतनमल बोथरा ने अपनी अभिव्यक्ति दी।

आज से दोपहर दो बजे के बाद आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में भिक्षु जश रसायण का वाचन प्रारम्भ हुआ। सुधर्मा सभा में आचार्यश्री के साथ चारित्रात्माओं की उपस्थिति भी थी। आचार्यश्री ने इसका अपने श्रीमुख से शुभारम्भ किया तो मुख्यमुनिश्री ने उसे अर्थसहित व्याख्यायित किया। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को भी समाहित किया। यह अवसर चारित्रात्माओं सहित सभी को विशेष रूप से आह्लादित करने वाला रहा।

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