ज्येष्ठ मास के बड़े मंगल का नाम आते ही मन में भक्ति, श्रद्धा और सेवा के दृश्य उभरने लगते हैं। सड़कों पर सजे भंडारे, प्यासों के लिए शीतल जल की व्यवस्था, प्रसाद वितरण और बजरंगबली के जयघोष से वातावरण भक्तिमय हो उठता है। यह परंपरा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सामूहिक संवेदना और सेवा-भाव का सुंदर प्रतीक है।
किन्तु एक प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है—क्या बड़े मंगल का अर्थ केवल एक दिन भोजन या शरबत वितरित करना है, अथवा इसके पीछे कोई गहरा आध्यात्मिक संदेश भी छिपा है?
हनुमानजी का संपूर्ण जीवन इस प्रश्न का उत्तर देता है।
हनुमान शक्ति के देवता हैं, पर उनकी शक्ति का उद्देश्य स्वयं का गौरव नहीं था। वे ज्ञान के सागर हैं, पर उनका ज्ञान अहंकार का कारण नहीं बना। वे अपार सामर्थ्य के स्वामी थे, फिर भी उन्होंने स्वयं को केवल प्रभु राम का सेवक कहा। यही कारण है कि हनुमान केवल पूजनीय नहीं, अनुकरणीय भी हैं।
आज बड़े मंगल पर हजारों लोग भंडारे करते हैं। यह एक पुण्य कार्य है। भूखे को भोजन देना, प्यासे को पानी पिलाना और जरूरतमंद की सहायता करना भारतीय संस्कृति में सर्वोच्च दान माना गया है। लेकिन यदि सेवा केवल एक दिन तक सीमित रह जाए और अगले ही दिन हम समाज की पीड़ा से विमुख हो जाएँ, तो क्या हम हनुमान के आदर्शों को पूर्णतः समझ पाए हैं?
हनुमानजी की सेवा अवसर देखकर नहीं होती थी। वह निरंतर थी। जब सीता माता की खोज का समय आया, वे आगे बढ़े। जब लक्ष्मण मूर्छित हुए, वे संजीवनी लेकर आए। जब रामकाज सामने आया, उन्होंने अपनी सीमाओं की नहीं, अपने दायित्व की चिंता की। उनकी सेवा किसी उत्सव की प्रतीक्षा नहीं करती थी।
यही बड़े मंगल का वास्तविक संदेश है।
सेवा केवल अन्नदान नहीं है। किसी निराश व्यक्ति को आशा देना भी सेवा है। किसी अशिक्षित बच्चे को शिक्षा दिलाना भी सेवा है। किसी वृद्ध के अकेलेपन को बाँटना भी सेवा है। किसी पीड़ित की आवाज बनना भी सेवा है। किसी दुखी मनुष्य के आँसू पोंछ देना भी सेवा है।
समाज में अनेक लोग ऐसे हैं जो भूख से अधिक उपेक्षा से पीड़ित हैं। अनेक लोग ऐसे हैं जिन्हें भोजन से अधिक सम्मान की आवश्यकता है। अनेक बच्चे ऐसे हैं जिन्हें प्रसाद से अधिक अवसर चाहिए। यदि बड़े मंगल का उत्सव हमें इन आवश्यकताओं के प्रति जागरूक कर दे, तो यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है।
आध्यात्मिकता का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार के दुःख को अपना दुःख समझना है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में सेवा को साधना का स्वरूप माना गया है। जब सेवा में अहंकार नहीं रहता, तब वह पूजा बन जाती है। जब दान में प्रदर्शन नहीं रहता, तब वह तपस्या बन जाता है। और जब परोपकार में स्वार्थ नहीं रहता, तब वह भक्ति बन जाती है।
बड़े मंगल हमें यही स्मरण कराता है कि बजरंगबली की कृपा केवल मंदिरों में माथा टेकने से नहीं, उनके गुणों को जीवन में उतारने से प्राप्त होती है। यदि हम इस दिन एक संकल्प लें कि वर्ष के शेष दिनों में भी किसी न किसी रूप में सेवा करते रहेंगे, तो शायद यही हनुमानजी को सबसे प्रिय अर्पण होगा।
भंडारे समाप्त हो जाएँगे, प्रसाद बँट जाएगा, पंडाल हट जाएँगे और उत्सव का शोर भी शांत हो जाएगा। लेकिन यदि सेवा का दीप हमारे भीतर प्रज्वलित हो गया, तो बड़े मंगल का उद्देश्य पूरा हो जाएगा।
क्योंकि सच्चा बड़ा मंगल केवल वह नहीं जो एक दिन मनाया जाए, बल्कि वह है जो मनुष्य के भीतर सेवा, करुणा और समर्पण का स्थायी संस्कार जगा दे।
यह लेख आध्यात्मिक होने के साथ-साथ सामाजिक चेतना और आत्ममंथन का स्वर भी रखता है, जो आपकी पसंद की चिंतनप्रधान संपादकीय शैली के निकट है।


