लखनऊ : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बहुजन समाज पार्टी ने अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा दी है। पार्टी की ओर से हाथरस के सादाबाद में आयोजित बड़ी सभा में राष्ट्रीय समन्वयक आकाश आनंद ने लंबे अंतराल के बाद चुनावी मैदान में वापसी का संकेत दिया। अपने भाषण में उन्होंने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए दोनों को ‘अंकल’ कहकर संबोधित किया।
30 वर्षीय आकाश आनंद ने अखिलेश यादव को ‘भैया’ कहने के बजाय ‘अंकल’ कहने के पीछे उम्र का तर्क दिया। उन्होंने कहा कि वह 30 वर्ष के हैं, जबकि अखिलेश यादव 50 वर्ष से अधिक उम्र के हैं। ऐसे में उन्हें ‘अंकल’ कहना स्वाभाविक है। आकाश का यह बयान महज राजनीतिक तंज नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे युवाओं के बीच अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
‘यूपी के दो लड़के’ की राजनीति को चुनौती
आकाश आनंद के ‘अंकल’ वाले बयान को उत्तर प्रदेश की पिछली चुनावी राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। वर्ष 2017 और 2024 के चुनावों में अखिलेश यादव और राहुल गांधी की जोड़ी को युवाओं के बीच ‘यूपी के दो लड़के’ के रूप में प्रस्तुत किया गया था।
अब आकाश आनंद इसी राजनीतिक छवि को चुनौती देते नजर आ रहे हैं। उनका संदेश यह है कि उत्तर प्रदेश में युवाओं की नई पीढ़ी के लिए अब पुराने राजनीतिक चेहरों के बजाय नए और युवा नेतृत्व की जरूरत है।
युवाओं को बसपा से जोड़ने की तैयारी
बहुजन समाज पार्टी लंबे समय से अपने परंपरागत दलित मतदाताओं के आधार पर चुनावी राजनीति करती रही है। हालांकि आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी इस आधार को विस्तार देने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।
मायावती ने आकाश आनंद को प्रदेश के सभी 75 जिलों में जाकर कार्यकर्ता सम्मेलन और जनसंपर्क अभियान चलाने की जिम्मेदारी दी है। इसके जरिए पार्टी पहली बार मतदान करने वाले युवाओं और नई पीढ़ी के मतदाताओं को अपने साथ जोड़ना चाहती है।
पार्टी की रणनीति में सामाजिक माध्यमों पर प्रचार, छोटे वीडियो और स्थानीय भाषा में सामग्री के जरिए युवाओं तक पहुंच बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है। बूथ स्तर पर युवाओं को जोड़ने की योजना के तहत प्रत्येक बूथ पर 10 युवा कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का लक्ष्य रखा गया है।
करीब दो करोड़ युवा मतदाताओं पर नजर
उत्तर प्रदेश की राजनीति में युवा मतदाता आने वाले विधानसभा चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 18 से 27 वर्ष की आयु के करीब 2.07 करोड़ मतदाता हैं। यह कुल मतदाताओं का लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा है।
राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से यह वर्ग कई विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी परिणाम प्रभावित करने की क्षमता रखता है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में करीब 99 सीटों पर जीत का अंतर 10 हजार मतों से कम रहा था। ऐसे में युवा मतदाताओं के एक छोटे हिस्से का भी रुख बदलना कई सीटों के परिणाम पर असर डाल सकता है।
परीक्षा, रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दों पर जोर
आकाश आनंद ने अपने भाषण में युवाओं से जुड़े मुद्दों को भी उठाया। उन्होंने परीक्षा में गड़बड़ी, रोजगार, शिक्षा और महंगाई का मुद्दा उठाते हुए सरकार पर निशाना साधा।
उन्होंने कहा कि केवल सड़कों पर प्रदर्शन करने या भाषण देने से व्यवस्था नहीं बदलती। व्यवस्था में बदलाव के लिए युवाओं को मतदान के माध्यम से अपनी राजनीतिक पसंद तय करनी होगी।
आकाश ने उत्तर प्रदेश की सरकार पर भी रोजगार और शिक्षा के मोर्चे पर विफल रहने का आरोप लगाया। उन्होंने परीक्षा में प्रश्नपत्र लीक होने और सरकारी नौकरियों के खाली पदों का मुद्दा उठाते हुए युवाओं से सरकार से पिछले वर्षों का हिसाब मांगने की अपील की।
भाजपा के साथ सपा-कांग्रेस भी निशाने पर
आकाश आनंद के भाषण में भाजपा के साथ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस भी निशाने पर रहीं। उन्होंने अखिलेश यादव और राहुल गांधी को ‘अंकल’ कहकर नई पीढ़ी की राजनीति का संदेश देने की कोशिश की।
उन्होंने समाजवादी पार्टी के पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण पर भी सवाल उठाए। वहीं कांग्रेस को लेकर कहा कि केवल भाजपा को हटाकर कांग्रेस को सत्ता में लाने से व्यवस्था में जरूरी बदलाव नहीं होगा।
मायावती के लिए आकाश आनंद क्यों महत्वपूर्ण?
मायावती की रणनीति में आकाश आनंद की भूमिका अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण दिखाई दे रही है। पार्टी के पास मजबूत पारंपरिक सामाजिक आधार है, लेकिन नई पीढ़ी और पहली बार मतदान करने वाले युवाओं तक पहुंच बनाना उसके लिए बड़ी चुनौती रही है।
आकाश आनंद को आगे करके बसपा एक साथ दो संदेश देने की कोशिश कर रही है। पहला, पार्टी अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को बनाए रखना चाहती है और दूसरा, वह युवा मतदाताओं के बीच नए नेतृत्व की छवि बनाना चाहती है।
आने वाले महीनों में आकाश आनंद का प्रदेशव्यापी दौरा और युवाओं के बीच उनकी सक्रियता यह तय करने में महत्वपूर्ण होगी कि बसपा की यह नई रणनीति चुनावी समर्थन में कितना बदलाव ला पाती है।








