आलोचना से होती है ऋजुता की प्राप्ति : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार को मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान सुधर्मा सभा में उपस्थित श्रद्धालु जनता को आज के निर्धारित विषय ‘आलोचना से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से वर्णित करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया कि आलोचना से जीव क्या उत्पन्न करता है? उत्तर दिया गया कि आलोचना शब्द का एक अर्थ निंदा, आलोचना करने वाला होता है। यहां आलोचना का उत्कर्ष रूप में है। यहां आलोचना अर्थ कि अपनी गलती को गुरु के सामने निवेदित कर देना अथवा प्रायश्चित्तदाता के समाने अपनी गलती को स्वीकार कर लेना।
प्रायश्चित्त के दस प्रकारों में पहला प्रकार आलोचना ही है। अलोचना अर्थात् अपने से बड़े को अपनी बात देना। आलोचना ऋजुता, सरलता के साथ जुड़ी हुई है। चलाकर बताना तो छोड़ दिया जाए, कई बार लोग गलती हो जाने के बाद पूछे जाने पर भी सरलता से सही उत्तर नहीं देते। जो सरलता से अपनी आलोचना गुरु के सामने निवेदित कर देता है, वह माया शल्य, निदान शल्य और मिथ्यादर्शन शल्य से बच सकता है। ये शूल मोक्ष मार्ग में बाधक हैं। माया, निदान और मिथ्यादर्शन- ये तीनों मोक्ष मार्ग के बाधक होते हैं।
जो आलोचना कर लेता है, वह श्रजु भाव वाला हो जाता है, उत्पन्न कर लेता है। छल, कपट से दूर हो जाना और ऋजु भाव वाले की शुद्धि होती है। आलोचना से आदमी सरलता को प्राप्त कर लेता है और उसकी शुद्धि होती है। आगम में कहा गया है कि आदमी आलोचना से ऋजु भाव को उत्पन्न कर लेता है। आदमी को झूठ, चोरी से बच सकता है और इर्मानदारी के पथ पर आगे बढ़ सकता है।
चारित्रात्माओं के लिए आलोचना बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। आलोचना में सरलता कितनी है, यह भी महत्त्वपूर्ण है। सरलता से बता देने से प्रायश्चित्तदाता से जो भी प्रायश्चित्त प्राप्त हो, उससे शुद्धि हो सकती है। प्रायश्चित्त देने वाले में भी गांभीर्य और निष्पक्षता होनी चाहिए। फैसला अपनी ओर से सही होना चाहिए। आलोयणा में जो भी प्रायश्चित्त आए उसे सहजता से स्वीकार करना भी आत्मा की शुद्धि का कारण बनता है। प्रायश्चित्त साधु-साध्वियों के लिए ही नहीं श्रावक-श्राविकाओं के लिए भी उतनी ही आवश्यक होती है। श्रावक-श्राविकाओं को अपने दोषों की आलोयणा कर लेना चाहिए। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए।