लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित जनता को आज के निर्धारित विषय ‘प्रतिक्रमण से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से विवेचित करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया कि प्रतिक्रमण से जीव क्या प्राप्त करता है? साधु चर्या का एक आवश्यक अंग है-प्रतिक्रमण। प्रातःकाल में सूर्योदय से पूर्ववर्ती एक मुहूर्त तथा सायंकाल सूर्यास्त से उत्तरवर्ती एक मुहूर्त-ये प्रतिक्रमण का निर्धारित समय है। साधु-साध्वियां जिस प्रकार आहार साथ बैठकर करते हैं, वैसे ही प्रतिक्रमण भी साथ बैठकर करने का प्रयास करना चाहिए।
न्यारा हो अथवा गुरुकुल साथ में प्रतिक्रमण करना अच्छी बात होती है। विधिवत प्रतिक्रमण करने का प्रयास होना चाहिए। खड़े-खड़े प्रतिक्रमण करना बहुत अच्छी बात होती है। जितना हो सके, प्रतिक्रमण विधिवत करने का ही प्रयास होना चाहिए। प्रतिक्रमण का अर्थ होता है लौटना। मान लिया जाए कि कोई साधु-साध्वियां अपने ठिकाने से बाहर जाना और वापस लौट आना ही प्रतिक्रमण है। संयम से असंयम की ओर और निर्दोषता से सदोषता में चले जाना और पुनः निर्दोषता में लौट आना ही प्रतिक्रमण होता है।
आदमी को अपने पीछे के समय का सिंहावलोकन करने का प्रयास होना चाहिए। पूरे दिन और रात में सोने समय तक कौन-सा कार्य किया। कितने कार्य अच्छे और दोष रहित रहे और कितने कार्यों में दोष आदि लग गए। जो दोष लग गए हैं हो उसको प्रतिक्रमण के माध्यम से शोधन करने का प्रयास करना चाहिए।
प्रतिक्रमण के माध्यम से व्रत के छेदों को ढंका जा सकता है और इसके माध्यम से पांच फायदे होते हैं। व्रत के छेद के ढकने से आश्रव निरुद्ध हो जाता है। अशुभ योग से जो कर्म बंधन हो रहा था, वह बंद हो गया। यह कितना बड़ा लाभ हो गया। दूसरा लाभ बताया गया है कि चारित्र में कहीं दोष लगे होते हैं तो वह भी धुल जाते हैं और चारित्र की धवल चद्दर धब्बों से रहित हो जाती है। प्रतिक्रमण से चारित्र रूपी अमल-धवल चद्दर दोष रूपी धब्बे से मुक्त हो जाती है।
तीसरा लाभ बताया गया कि प्रतिक्रमण से व्रत छिद्र के ढंक जाने से साधु आठ प्रवचन माताओं में उपयुक्त, दत्तचित्त और जागरूक बनता है। समितियों-गुप्तियों के प्रति भी साधु जागरूक हो जाता है। चौथा लाभ बताया गया कि संयम के प्रति एक लय और एक रस बन जाते हैं। उसकी चेतना संयममय हो जाती है। पांच लाभ बताया गया कि बहुत अच्छी समाधि की प्राप्ति हो जाती है। अच्छे ढंग से प्रतिक्रमण होने साधु अच्छी समाधि की स्थिति में रहता है और अच्छी समाधि में विहार करता है।
श्रावक-श्राविकाओं को भी अच्छे ढंग से प्रतिक्रमण करने का प्रयास करना चाहिए। पर्युषण पर्वाधिराज व भगवती संवत्सरी का आगमन होने वाला है। पर्युषण की अच्छी आराधना करने का प्रयास हो। साधु, साध्वियां व श्रावक-श्राविकाएं भी इसे अच्छे ढंग से करने का प्रयास करें। प्रतिक्रमण के प्रति सभी को जागरूक रहने का प्रयास होना चाहिए। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में दो दिवसीय प्रेक्षाध्यान सम्मेलन का शुभारम्भ हुआ। इस संदर्भ में जैन विश्व भारती के अध्यक्ष श्री अमरचन्द लुंकड़, प्रेक्षा इण्टरनेशनल के मंत्री श्री गौरव कोठारी, अध्यात्म साधना केन्द्र की ओर से श्री केसी जैन तथा प्रेक्षा विश्व भारती के अध्यक्ष श्री गौतम बाफना ने पूज्यप्रवर के समक्ष अपनी अभिव्यक्ति दी। परम पूज्य आचार्यश्री महाश्रमणजी ने इस संदर्भ में पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि प्रेक्षाध्यान के लिए चार संस्थाओं की चतुष्टयी है। ये चारों संस्थाओं का सम्मेलन है। इनके द्वारा प्रेक्षाध्यान का जितना प्रसार हो सके, करने का प्रयास होना चाहिए। प्रेक्षाध्यान के शिविरों में जितनी एकरूपता रहे, करने का प्रयास करना चाहिए। एक सहचिंतन होना चाहिए। यह सम्मेलन में जितना चिंतन-मंथन हो सके, करने का प्रयास हो। युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी ने भी इस सम्मेलन के संभागियों को उद्बोधित किया।








