कायोत्सर्ग से प्राप्त होते हैं पांच लाभ : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी विशाल धवल सेना के साथ सानंद जैन विश्व भारती में मंगल प्रवास कर रहे हैं। योगक्षेम वर्ष का यह प्रलम्ब प्रवास न केवल लाडनूंवासियों, अपितु देश-विदेश में रहने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए लाभदायी बन रहा है। आचार्यश्री के एक स्थान पर लम्बे प्रवास से उन्हें अपने आराध्य तक पहुंचने व दर्शन, सेवा व उपासना में सुविधा प्राप्त हो जा रही है। वर्तमान में चतुर्मासकाल भी प्रारम्भ है तो धार्मिक-आध्यात्मिक गतिविधियां भी निरंतर संचालित हो रही हैं।
नित्य की भांति गुरुवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के लिए सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘कायोत्सर्ग से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया कि कायोत्सर्ग से जीव क्या प्राप्त करता है? कायोत्सर्ग में देखें तो कार्य और उत्सर्ग- दो शब्दों का योग है। कायोत्सर्ग अर्थात् काया का उत्सर्ग कर देना, त्याग कर देना। शरीर का उत्सर्जन किस प्रकार किया जा सकता है? काय उत्सर्ग का एक रूप है शरीर की चंचलता का उत्सर्ग। शरीर की चंचलता का त्याग करना कायोत्सर्ग होता है। शरीर से आसक्ति नहीं रखना, मोह नहीं रखना भी कायोत्सर्ग है। शरीर के तनाव को छोड़कर शरीर को शिथिल कर देना भी कायोत्सर्ग होता है। इस प्रकार शरीर की चंचलता का विसर्जन करना, शरीर के प्रति होने वाले ममत्व का विसर्जन करना और शरीर में होने वाले तनाव का विसर्जन कर देना- ये तीनों कायोत्सर्ग के रूप हो सकते हैं।
प्रेक्षाध्यान साधना विधि में कायोत्सर्ग के दो रूपों को देख सकते हैं। शरीर को चंचलता को रोक लेना, यह ध्यान का आधार होता है। ध्यान करना है तो शरीर की स्थिरता पर ध्यान देना सबसे आवश्यक होता है। शरीर को शिथिल रखने का प्रयास हो। शरीर का ममत्व छोड़ देना तो बहुत ऊंची स्थिति होती है। शरीर का ममत्व समाप्त हो जाए तो साधना की बहुत ऊंची स्थिति हो सकती है।
कायोत्सर्ग से पांच लाभ बताए गए हैं। कायोत्सर्ग से शरीर की जड़ता की शुद्धि होती है। मति भी निर्मल बनती है। कायोत्सर्ग करने से सुख-दुःख में भी स्थिरता बनी रहती है। सुख-दुःख को सहन करने की क्षमता का विकास हो सकता है। कायोत्सर्ग करने से अनुप्रेक्षा भी अच्छी हो सकती है। कायोत्सर्ग कर लेने से ध्यान का प्रयोग भी अच्छा हो सकता है। इस प्रकार कायोत्सर्ग से ये पांच लाभ प्राप्त हो सकते हैं।
आचार्यश्री ने चतुर्विध धर्मसंघ को थोड़ी देर के लिए लोगस्स के ध्यान का प्रयोग भी कराया। कायोत्सर्ग से भी प्रवृत्तियों की विशुद्धि हो सकती है। प्रवृत्तियों की विशुद्धि से आदमी हल्का अनुभव कर सकता है। इसलिए आदमी को कायोत्सर्ग का प्रयोग करने का प्रयास करना चाहिए।