ओबीसी आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सीएसई-2025 की सेवा आवंटन पर संकट

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नई दिल्ली : ओबीसी क्रीमी लेयर से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च के फैसले को लेकर केंद्र सरकार ने स्थिति स्पष्ट करने के लिए अदालत का रुख किया है। कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर फैसले के प्रभाव और इसे लागू करने को लेकर उचित निर्देश मांगे हैं। इस मामले का असर सिविल सेवा परीक्षा के करीब 100 ऐसे अभ्यर्थियों पर पड़ सकता है, जिन्हें क्रीमी लेयर के आधार पर ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं दिया गया था।

सीएसई-2025 की सेवा आवंटन प्रक्रिया पर असर की आशंका

केंद्र ने अदालत को बताया है कि 11 मार्च का फैसला सिविल सेवा परीक्षा 2025 का अंतिम परिणाम जारी होने के पांच दिन बाद आया था। सरकार को आशंका है कि फैसले को पूर्व प्रभाव से लागू करने पर श्रेणीवार मेरिट और सेवा आवंटन की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसका असर आईएएस और आईपीएस समेत अन्य सेवाओं के कैडर आवंटन, प्रशिक्षण कार्यक्रम, बैच की संख्या और अधिकारियों की वरिष्ठता पर भी पड़ सकता है।

क्या है पूरा मामला

मामला वर्ष 1993 के सरकारी ज्ञापन और वर्ष 2004 में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग की ओर से जारी स्पष्टीकरण से जुड़ा है। वर्ष 1993 के नियमों में ओबीसी क्रीमी लेयर तय करने के लिए वेतन और कृषि आय को आय-सम्पत्ति परीक्षण में शामिल नहीं किया गया था। बाद में 2004 के स्पष्टीकरण में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों की वेतन आय को भी क्रीमी लेयर तय करने के मानदंड में शामिल किया गया।

इसके बाद सिविल सेवा परीक्षा में चयनित करीब 100 अभ्यर्थियों के ओबीसी दावों को क्रीमी लेयर के आधार पर खारिज किया गया। इनमें कई अभ्यर्थियों के पास सक्षम अधिकारियों द्वारा जारी ओबीसी प्रमाणपत्र भी थे। प्रभावित अभ्यर्थियों ने अलग-अलग अदालतों का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने आय को अकेला आधार मानने पर उठाया सवाल

11 मार्च को जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा था कि ओबीसी क्रीमी लेयर तय करने के लिए केवल आय को एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक उपक्रम या निजी क्षेत्र में कार्यरत व्यक्ति के बच्चों को केवल वेतन आय के आधार पर आरक्षण से बाहर करना, उनके माता-पिता के पद और सामाजिक स्थिति पर विचार किए बिना, समान स्थिति वाले अभ्यर्थियों के साथ असमान व्यवहार हो सकता है।

11 सितंबर तक लागू करने की समयसीमा

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले को लागू करने के लिए छह महीने का समय दिया था। यह अवधि 11 सितंबर को समाप्त हो रही है। केंद्र अब चाहता है कि अदालत विशेष रूप से सीएसई-2025 की सेवा आवंटन प्रक्रिया पर फैसले के प्रभाव को स्पष्ट करे, ताकि पहले से पूरी हो चुकी चयन प्रक्रिया में बड़े बदलाव से प्रशासनिक और कानूनी जटिलताएं न पैदा हों।