डेस्क : तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बड़ा कदम उठाया। टीएमसी महासचिव और लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी की याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने सभी 20 सांसदों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष से इन सांसदों की अयोग्यता संबंधी याचिकाओं पर जल्द फैसला लेने का निर्देश देने की मांग की थी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने बागी सांसदों से जवाब मांगा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय और लोकसभा महासचिव को नोटिस जारी करने से इनकार कर दिया। अदालत में उनकी ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए।
अयोग्यता की कार्रवाई में देरी का मामला
अभिषेक बनर्जी ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि 20 सांसदों के खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला लेने में देरी हो रही है। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष से संविधान के दलबदल विरोधी प्रावधानों के तहत इन मामलों का जल्द निपटारा करने की मांग की थी।
बनर्जी ने इससे पहले इन सांसदों के खिलाफ अलग-अलग अयोग्यता याचिकाएं दाखिल की थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने 27 जुलाई को लिखित रूप से याद दिलाने के बाद 12 अगस्त को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात भी की थी।
एनसीपीआई से जुड़ने का दावा
यह विवाद टीएमसी के संसदीय दल में बगावत के बाद सामने आया। पार्टी के 20 लोकसभा सांसदों ने टीएमसी से अलग होकर त्रिपुरा स्थित नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) के साथ जुड़ने या विलय करने की घोषणा की थी। इन सांसदों ने लोकसभा में अलग दल के रूप में मान्यता देने की मांग भी की है।
टीएमसी का तर्क है कि इन सांसदों ने पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव जीता था और किसी अन्य राजनीतिक संगठन से जुड़ना स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ने के समान है। पार्टी के अनुसार, ऐसे में संविधान के दलबदल विरोधी कानून के तहत उनकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है।
बागी सांसदों में सायोनी घोष, यूसुफ पठान, शताब्दी रॉय, काकोली घोष दस्तीदार, रचना बनर्जी, दीपक अधिकारी और जून मालिया समेत कुल 20 सांसद शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट में इसी तरह का एक अन्य मामला भी लंबित है, जिसमें शिवसेना (यूबीटी) ने अपने छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने के मामले को चुनौती दी है।








