महंगी दवाओं को लेकर सियासत गरम, कांग्रेस ने केंद्र पर साधा निशाना

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नई दिल्ली :  महंगी दवाओं और कैंसर के इलाज के बढ़ते खर्च को लेकर कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर हमला बोला है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि जीवनरक्षक दवाओं की ऊंची कीमतों के कारण मरीजों और उनके परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। उन्होंने केंद्र से सवाल किया कि जब कानून में जनहित में सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के प्रावधान मौजूद हैं, तो उनका इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा है।

जयराम रमेश ने एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि 74 रुपये की कीमत वाला एक इंजेक्शन 4,980 रुपये के एमआरपी पर बेचा जा रहा है। उन्होंने कहा कि दवाओं की कीमतों में इस तरह का अंतर गंभीर सवाल खड़े करता है। कांग्रेस नेता ने उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े कुछ मामलों का भी उल्लेख करते हुए सरकार की दवा मूल्य नीति पर सवाल उठाए।

रमेश ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एक दवा का उदाहरण देते हुए कहा कि उसकी 21 दिन की खुराक पर करीब 58 हजार रुपये खर्च होते हैं। इस हिसाब से एक साल का इलाज करीब 10 लाख रुपये तक पहुंच सकता है। उन्होंने कहा कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे परिवारों के लिए इतनी महंगी दवाएं बड़ी आर्थिक चुनौती हैं।

पेटेंट कानून का किया जिक्र

कांग्रेस नेता ने पेटेंट कानून की धारा 92 और 100 का हवाला देते हुए कहा कि जनहित और सरकारी उपयोग के लिए कानून में विशेष प्रावधान मौजूद हैं। उनका कहना था कि सरकार इन प्रावधानों का इस्तेमाल कर जीवनरक्षक दवाओं को जरूरतमंद मरीजों तक कम कीमत पर पहुंचा सकती है।

जयराम रमेश ने केंद्र सरकार से पूछा कि जब कानून में ऐसे प्रावधान उपलब्ध हैं तो गंभीर बीमारियों की दवाओं की कीमत कम करने के लिए उनका प्रभावी इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा है। उन्होंने सरकार से दवा की कीमतों को लेकर स्पष्ट नीति और मरीजों को राहत देने की मांग की।

‘झोला उठाने का समय आ रहा’

दवाओं की कीमतों के मुद्दे पर जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी राजनीतिक निशाना साधा। उन्होंने प्रधानमंत्री के पुराने ‘झोला उठाने’ वाले बयान का जिक्र करते हुए कहा कि मरीजों को सस्ती दवाएं कब मिलेंगी, सरकार को इसका जवाब देना चाहिए। इसी क्रम में उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि ‘झोला उठाने का समय जल्दी आ रहा है।’

दवाओं की कीमतों को लेकर कांग्रेस का यह हमला ऐसे समय में सामने आया है, जब कैंसर समेत गंभीर बीमारियों के इलाज में होने वाले खर्च को लेकर मरीजों और उनके परिवारों की चिंता लगातार राजनीतिक मुद्दा बन रही है। दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि आवश्यक दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए मूल्य निर्धारण और सीलिंग प्राइस जैसी व्यवस्थाएं लागू हैं।