संयुक्त राष्ट्र के ढांचे में बदलाव जरूरी, मौजूदा व्यवस्था बड़े संकटों में बेअसर: जयशंकर

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नई दिल्ली : विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधार की जरूरत पर एक बार फिर जोर देते हुए कहा है कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था कई बड़े संकटों में प्रभावी निर्णय लेने में असफल रही है। कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव में उन्होंने कहा कि खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष, यूक्रेन युद्ध, अफ्रीका के विभिन्न संकट और कोविड महामारी जैसे मामलों में संयुक्त राष्ट्र की निर्णय प्रक्रिया का प्रभाव सीमित दिखाई दिया।

जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि परिषद में लगातार बने रहने वाले गतिरोध के कारण संयुक्त राष्ट्र की प्रभावशीलता प्रभावित हो रही है। उनके मुताबिक, सुरक्षा परिषद आज की दुनिया और उसके हितों का पूरी तरह प्रतिनिधित्व नहीं करती।

विदेश मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा ढांचे को पुराना बताते हुए कहा कि जब इस संस्था की स्थापना हुई थी, तब इसमें 51 सदस्य देश थे। आज सदस्य देशों की संख्या करीब चार गुना हो चुकी है, लेकिन संस्था का प्रबंधन ढांचा लगभग उसी पुराने स्वरूप में बना हुआ है। उन्होंने कहा कि जब संस्था का आकार इतना बढ़ गया है तो उसके कामकाज और निर्णय लेने की व्यवस्था में भी उसी अनुरूप बदलाव होना चाहिए।

जयशंकर ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र में सुधार की प्रक्रिया में कुछ देश बाधा डाल रहे हैं। हालांकि उन्होंने किसी देश का नाम नहीं लिया। उन्होंने कहा कि सुधार रोकने के लिए अफ्रीका के नाम का इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि अफ्रीकी देश खुद संयुक्त राष्ट्र में सुधार को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर चुके हैं। अंतर-सरकारी वार्ताओं में अफ्रीकी देशों ने यह भी बताया है कि वे किस तरह के बदलाव चाहते हैं।

उन्होंने कहा कि दुनिया के सामने अब सवाल यह है कि वह संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा अप्रभावी स्थिति को आखिर कब तक स्वीकार करती रहेगी। साथ ही जयशंकर ने स्पष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र की आज भी आवश्यकता है और इस संस्था ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

विदेश मंत्री ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र का विकल्प तलाशने के बजाय उसे अधिक प्रभावी और प्रतिनिधित्वकारी बनाने की दिशा में काम किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि दुनिया को संयुक्त राष्ट्र से दूर जाने के बजाय उसके सुधार पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन इसके लिए संयुक्त राष्ट्र को भी सुधार की प्रक्रिया में सहयोग करना होगा। जयशंकर इससे पहले भी कह चुके हैं कि जरूरत संयुक्त राष्ट्र को खत्म करने की नहीं, बल्कि एक बेहतर और अधिक प्रभावी संयुक्त राष्ट्र बनाने की है।