अनुराधा पौडवाल ने फिल्मों से बनाई दूरी, अलका याग्निक के लिए खुले नए रास्ते

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मनोरंजन डेस्क: हिंदी सिनेमा में 1990 के दशक का संगीत आज भी लोगों के दिलों में खास जगह रखता है। इस दौर में अलका याग्निक, अनुराधा पौडवाल, कुमार सानू और उदित नारायण जैसे गायकों ने अपनी आवाज से संगीत की दुनिया में अलग पहचान बनाई। अब मशहूर संगीत निर्माता रमेश तौरानी ने खुलासा किया है कि उस दौर में अलका याग्निक को सबसे अधिक गाने मिलने के पीछे अनुराधा पौडवाल का एक अहम फैसला भी था।

रमेश तौरानी ने ट्रेड विश्लेषक कोमल नाहटा के पॉडकास्ट ‘गेम चेंजर्स: द म्यूजिक सीरीज’ में बातचीत के दौरान 90 के दशक के संगीत जगत और गायकों की लोकप्रियता से जुड़े कई पहलुओं पर चर्चा की।

अनुराधा पौडवाल के फैसले से बदले समीकरण

रमेश तौरानी के मुताबिक, उस समय लता मंगेशकर और आशा भोसले हिंदी फिल्म संगीत की स्थापित आवाजें थीं। संगीतकारों की पहली पसंद लता मंगेशकर होती थीं, जबकि अलका याग्निक और अनुराधा पौडवाल भी प्रमुख गायिकाओं में शामिल थीं।

उन्होंने बताया कि उस दौर में अनुराधा पौडवाल को लता मंगेशकर की अगली पीढ़ी की आवाज के रूप में देखा जाने लगा था, जबकि अलका याग्निक की तुलना आशा भोसले से की जाती थी। लेकिन अनुराधा पौडवाल ने फिल्मों के लिए गाना बंद कर टी-सीरीज के साथ अपने काम पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया। इससे अलका याग्निक के लिए नए अवसर खुले।

तौरानी के अनुसार, अनुराधा पौडवाल के फिल्मों से दूरी बनाने के बाद अलका याग्निक को दोनों तरह के गाने मिलने लगे। उन्हें एकल गीतों के साथ युगल गीत और शायरी वाले गीत गाने के भी अधिक अवसर मिले।

अलका याग्निक को मिलने लगे सबसे ज्यादा गाने

रमेश तौरानी ने बताया कि उस समय अलका याग्निक की मांग काफी बढ़ गई थी। उन्होंने यह भी कहा कि कुमार सानू, उदित नारायण और सोनू निगम जैसे गायकों के बीच अलका याग्निक को सबसे ज्यादा गाने मिल रहे थे।

यह वह दौर था, जब हिंदी फिल्मों के संगीत ने नई ऊंचाइयां हासिल कीं। ‘कयामत से कयामत तक’, ‘आशिकी’, ‘साजन’ और ‘फूल और कांटे’ जैसी फिल्मों के गीतों ने नए गायकों को लोकप्रियता दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

अनुराधा पौडवाल ने भक्ति संगीत पर किया ध्यान केंद्रित

अनुराधा पौडवाल 1980 के दशक के अंतिम वर्षों और 1990 के दशक की शुरुआत में हिंदी फिल्म संगीत की प्रमुख गायिकाओं में शामिल थीं। ‘आशिकी’, ‘दिल है कि मानता नहीं’ और ‘साजन’ जैसी फिल्मों के गीतों ने उनकी लोकप्रियता को नई ऊंचाई दी थी।

हालांकि, अपने करियर के शिखर पर उन्होंने फिल्मी पार्श्व गायन से दूरी बनाने का फैसला किया और धीरे-धीरे भक्ति संगीत पर अधिक ध्यान केंद्रित किया। टी-सीरीज के साथ उनका जुड़ाव भी इस दौर में महत्वपूर्ण रहा।

90 के दशक में अलका की आवाज का रहा दबदबा

अनुराधा पौडवाल के फिल्मों से दूरी बनाने के बाद अलका याग्निक ने हिंदी सिनेमा में अपनी मजबूत जगह बनाई। नदीम-श्रवण और अनु मलिक जैसे संगीतकारों के साथ उनके गीत बेहद लोकप्रिय हुए। रोमांटिक गीतों से लेकर युगल गीतों तक, उनकी आवाज 90 के दशक के हिंदी फिल्म संगीत की पहचान बन गई।

रमेश तौरानी के इस खुलासे से उस दौर के संगीत उद्योग की कार्यप्रणाली और गायकों के करियर पर पेशेवर फैसलों के प्रभाव को समझने का एक नया नजरिया सामने आया है। यह भी स्पष्ट होता है कि प्रतिभा के साथ सही अवसर और बदलते समीकरण किसी कलाकार के करियर को नई दिशा देने में अहम भूमिका निभाते हैं।