नई दिल्ली :मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के इस्तीफे की मांग से जुड़ी सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर विवाद बढ़ गया है। इस मामले में कांग्रेस, राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, अखिलेश यादव और तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा समेत कई नेताओं के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिका में संबंधित पोस्ट को लेकर आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने और न्यायपालिका की गरिमा तथा स्वतंत्रता की रक्षा के लिए दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है।
कांग्रेस की पोस्ट से शुरू हुआ विवाद
विवाद की शुरुआत केरल कांग्रेस के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से साझा की गई एक पोस्ट के बाद हुई। इस पोस्ट में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के इस्तीफे की मांग की गई थी। पोस्ट में कहा गया था कि यदि कानून-व्यवस्था का विषय न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता, तो मुख्य न्यायाधीश को पद छोड़ देना चाहिए।
पोस्ट सामने आने के बाद इस पर राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा शुरू हो गई। बाद में संबंधित पोस्ट को हटा दिया गया। रिपोर्टों के अनुसार, कांग्रेस की ओर से कहा गया कि यह पोस्ट बिना अनुमति के साझा की गई थी।
कई राजनीतिक नेताओं के नाम याचिका में शामिल
याचिका में कांग्रेस पार्टी, राहुल गांधी, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी, अखिलेश यादव और महुआ मोइत्रा समेत कई लोगों को प्रतिवादी बनाया गया है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ इस तरह की सार्वजनिक टिप्पणी और इस्तीफे की मांग न्यायपालिका की स्वतंत्रता तथा उसकी प्रतिष्ठा को प्रभावित कर सकती है।
याचिका में कुछ अन्य सोशल मीडिया पोस्ट का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता ने अदालत से आग्रह किया है कि संबंधित पक्षों की भूमिका पर विचार करते हुए उचित कानूनी कार्रवाई की जाए।
हालांकि, किसी व्यक्ति का नाम याचिका में प्रतिवादी के रूप में शामिल होने का अर्थ यह नहीं है कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप साबित हो गए हैं।
संविधान के प्रावधानों का दिया हवाला
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 121 और 124(4) का उल्लेख किया गया है। अनुच्छेद 121 संसद में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा से संबंधित प्रतिबंध का प्रावधान करता है, जबकि अनुच्छेद 124(4) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया निर्धारित करता है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि न्यायाधीशों के खिलाफ सार्वजनिक दबाव बनाने वाले अभियानों के मामले में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक व्यवस्था की रक्षा के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश आवश्यक हैं। इसी आधार पर अदालत से आपराधिक अवमानना की कार्यवाही पर विचार करने का अनुरोध किया गया है।
अदालत के रुख पर नजर
मामले में याचिका दायर होने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही पर नजर रहेगी। याचिका में की गई मांगों और आरोपों पर अदालत का रुख सामने आने के बाद ही आगे की स्थिति स्पष्ट होगी। फिलहाल, यह मामला न्यायपालिका की स्वतंत्रता, राजनीतिक अभिव्यक्ति और अदालत की अवमानना से जुड़े सवालों के कारण चर्चा में है।








