मुंबई : बॉम्बे हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पति और उसके पांच रिश्तेदारों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि पत्नी से कपड़े और बर्तन धुलवाने का आरोप अपने आप में वैवाहिक क्रूरता का अपराध नहीं बनता। अदालत ने यह भी पाया कि शिकायत में लगाए गए आरोप सामान्य और अस्पष्ट थे तथा उनमें सभी आरोपितों की भूमिका स्पष्ट रूप से सामने नहीं आती थी।
क्या है पूरा मामला?
मामले के अनुसार, एक महिला ने अपने पति और उसके पांच रिश्तेदारों के खिलाफ प्रताड़ना की शिकायत दर्ज कराई थी। महिला का आरोप था कि उसे संतान पैदा करने में असमर्थता को लेकर ताने दिए जाते थे। उसने यह भी आरोप लगाया कि वर्ष 2024 में उसका पति उसे एक रिश्तेदार के घर ले गया, जहां उससे कपड़े और बर्तन धुलवाए गए। महिला ने गाली-गलौज करने और घर से निकालने की धमकी देने के आरोप भी लगाए थे।
प्राथमिकी रद्द करने की मांग
पति और उसके रिश्तेदारों ने प्राथमिकी को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। उनकी ओर से दलील दी गई कि शिकायत में लगाए गए आरोप अस्पष्ट हैं और प्रत्येक आरोपित की कथित भूमिका का अलग-अलग विवरण नहीं दिया गया है।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने शिकायत में दर्ज आरोपों और उपलब्ध तथ्यों का परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि आरोपों में कथित घटनाओं की परिस्थितियों और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका के बारे में पर्याप्त स्पष्टता नहीं थी।
अदालत ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति अभय जे. मंत्री की पीठ ने कहा कि केवल पत्नी से कपड़े और बर्तन धुलवाने के आरोप से भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत वैवाहिक क्रूरता का अपराध स्वतः सिद्ध नहीं होता। अदालत ने शिकायत में लगाए गए आरोपों की प्रकृति और मामले की परिस्थितियों पर विचार करते हुए पाया कि प्राथमिकी के आधार पर आरोपितों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना उचित नहीं होगा।
अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि पति के रिश्तेदार अलग-अलग शहरों में रहते थे और उनके खिलाफ शिकायत में विशिष्ट आरोपों का अभाव था। इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने पति और उसके पांच रिश्तेदारों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द कर दी।
तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर होगा निर्णय
अदालत के फैसले से स्पष्ट होता है कि वैवाहिक विवादों में दर्ज प्रत्येक शिकायत का मूल्यांकन उसके तथ्यों, आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना आवश्यक है। केवल सामान्य आरोपों के आधार पर आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती। हालांकि, इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि घरेलू हिंसा या वैवाहिक उत्पीड़न की शिकायतें अपने आप में निराधार हैं। प्रत्येक मामले में परिस्थितियों के अनुसार कानूनी निर्णय लिया जाता है।









