मनोज्ञ विषयों से विरक्ति ही वीतरागता का वास्तविक लाभ : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शनिवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘वीतरागता से क्या मिलेगा?’ तथा गत दिवस (शुक्रवार) के विषय को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि जीवन में गुणों का महत्त्व है, गुणों से ही आदमी की पूजा होती है। उम्र कितनी है, यह एक पक्ष है, परंतु गुण कितने हैं, इसका विशिष्ट महत्त्व होता है। जब सर्वगुण संपन्नता यानी ज्ञान, दर्शन और चारित्र के जैसे गुण आ जाते हैं, तो उसका परिणाम अपुनरावृत्ति यानी मोक्ष है। ऐसा जीव शारीरिक और मानसिक दुखों का भागी नहीं बनता। रूप की अपेक्षा योग्यता और गुणवत्ता का मूल्य अधिक होता है, जैसे सोने के कलश की बजाय मिट्टी की मटकी का ठंडा पानी अधिक संतोष देता है। सिद्ध भगवान के पास न शरीर है और न मन है, इसलिए उन्हें न शरीर का दुख हो सकता है और न मन का दुख हो सकता है। भगवान से पूछा गया कि वीतरागता से जीव क्या प्राप्त करता है ? वीतराग यानी जिसका राग समाप्त हो गया, उसका द्वेष तो स्वतः ही चला गया। वीतरागता के तीन लाभ बताए गए हैं- स्नेहानुबंधनों का विच्छेद, तृष्णानुबंधनों का विच्छेद और मनोज्ञ शब्द, स्पर्श, रस, रूप व गंधों से विरक्ति। साधना में काम राग, स्नेह राग और दृष्टि राग बाधक हैं।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि निष्ठा का एक सकारात्मक पक्ष भी है, जैसे गुरु के प्रति अटूट आस्था। यदि गुरु के हाथ का लिखा पत्र हो, तो उसके अक्षर कैसे भी हो उसका महत्त्व किसी और से अधिक है। गुरु ने यदि डांट भी दिया या कुछ कह भी दिया, तो उसे विनय से सिर-माथे स्वीकार करना निष्ठा है। गुरु और शिष्य का धार्मिक संबंध सर्वाेपरि है। यह निष्ठा का सकारात्मक पक्ष है। स्नेह का संबंध व्यक्तियों जैसे पुत्र या भाई के प्रति होता है, जबकि तृष्णा पदार्थों की लालसा है। वीतरागता प्राप्त होने पर इन दोनों प्रकार के अनुबंधनों का विच्छेद हो जाता है। जब व्यक्ति वीतरागी बन जाता है, तो वह सांसारिक मोह और पदार्थों की आसक्ति से मुक्त हो जाता है। मनोज्ञ विषयों के प्रति विरक्ति ही वीतरागता का वास्तविक लाभ है, जो जीव को राग-द्वेष से ऊपर उठाकर परम शांति की ओर ले जा सकता है।
गत कल अर्थात् शुक्रवार को प्रातःकाल में मुनि रमणीयकुमारजी का प्रयाण सिद्धि तप में हो गया। इस संदर्भ में आज के मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में स्मृतिसभा का भी आयोजन हुआ। आचार्यश्री ने मुनि रमणीयकुमारजी का संक्षिप्त जीवन परिचय प्रदान करते हुए उनकी आत्मा के प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना करते हुए चतुर्विध धर्मसंघ को चार लोगस्स का ध्यान भी कराया। तदुपरान्त युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी, साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी व साध्वीवर्याजी ने भी उनकी आत्मा के ऊर्ध्वारोहण की कामना की। उनकी संसारपक्षीया पुत्री साध्वी प्रणवप्रभाजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। मुनि विजयकुमारजी ने अपनी अभिव्यक्ति देते हुए अन्य संतों के साथ गीत का संगान किया। संसारपक्षीया गृहस्थ पुत्री श्रीमती पूर्वाजी ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। मुनि कमलकुमारजी ने भी उनकी आत्मा के प्रति मंगलकामना की। छापर समाज की ओर से श्री मनोज नाहटा ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी।