डेस्क : भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने शनिवार को बेंगलुरु स्थित राष्ट्रीय विधि विद्यालय विश्वविद्यालय के ३४वें वार्षिक दीक्षांत समारोह में बाहरी ताकतों का जिक्र करते हुए अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कुछ बाहरी ताकतों के कारण ऐसी परिस्थितियां पैदा हुईं, जिनसे समारोह के आयोजन को लेकर अनिश्चितता का माहौल बन गया था। हालांकि, तमाम चुनौतियों के बावजूद समारोह आयोजित किया गया और विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान की गईं।
बाहरी ताकतों के कारण बना असमंजस
विश्वविद्यालय के कुलाधिपति के रूप में विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि कुछ बाहरी ताकतों के कारण उत्पन्न परिस्थितियों ने इस महत्वपूर्ण अवसर को लेकर असमंजस पैदा कर दिया था।
गौरतलब है कि विश्वविद्यालय का ३४वां दीक्षांत समारोह पहले १२ सितंबर को प्रस्तावित था, लेकिन २७ अगस्त को अपरिहार्य परिस्थितियों का हवाला देते हुए इसे रद्द कर दिया गया था। बाद में समारोह की नई तारीख १७ अक्टूबर निर्धारित की गई। समारोह को लेकर विवाद मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और भारतीय विधिज्ञ परिषद के अध्यक्ष को आमंत्रित किए जाने के विरोध के बीच सामने आया था।
हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने अपने संबोधन में कथित बाहरी ताकतों की स्पष्ट पहचान नहीं बताई।
कानून के पेशे में साहस और ईमानदारी जरूरी
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कानून की पढ़ाई पूरी कर रहे विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि कानूनी पेशा कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है। इस क्षेत्र में कानून और न्यायिक फैसलों की जानकारी के साथ-साथ न्याय के पक्ष में खड़े होने का साहस भी जरूरी है।
उन्होंने विद्यार्थियों को उन लोगों की आवाज सुनने की सलाह दी, जिनकी बात अक्सर समाज में अनसुनी रह जाती है। उन्होंने कहा कि कानून के क्षेत्र में बौद्धिक स्वतंत्रता के साथ निष्पक्षता और संवेदनशीलता भी आवश्यक है।
किसी व्यक्ति के विचारों से असहमत होने का अर्थ उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाना नहीं होना चाहिए। दूसरे पक्ष को सुनना और उसके विचारों का सम्मान करना एक जिम्मेदार कानूनी पेशेवर की पहचान है।
सिद्धांतों से समझौता न करने की सलाह
मुख्य न्यायाधीश ने विद्यार्थियों को अपने पेशेवर जीवन में ईमानदारी और नैतिक मूल्यों को प्राथमिकता देने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि करियर में आगे बढ़ने के दौरान कई बार आसान रास्ते अपनाने या अपने सिद्धांतों से समझौता करने का प्रलोभन मिल सकता है, लेकिन विद्यार्थियों को इससे बचना चाहिए।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कानून केवल पुस्तकों, अधिनियमों और न्यायिक उदाहरणों तक सीमित नहीं है। यह अधिवक्ताओं के तर्कों, उनके द्वारा तैयार किए गए अनुबंधों, दी गई कानूनी सलाह और न्यायाधीशों के फैसलों के माध्यम से विकसित होता है।
इसलिए कानूनी पेशे से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाने में योगदान दे।
संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा जरूरी
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि वकालत के माध्यम से समाज की सेवा करने का अवसर मिलता है। अन्याय को दूर करना, नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना और संविधान के मूल्यों को बनाए रखना इस पेशे की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं।
उन्होंने उपाधि प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों से अपील की कि वे विश्वविद्यालय से प्राप्त शिक्षा और मूल्यों को अपने जीवन में बनाए रखें। देश को उनसे केवल कुशल अधिवक्ता बनने की ही अपेक्षा नहीं है, बल्कि समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने और लोगों के बीच न्याय एवं विश्वास की भावना मजबूत करने की भी अपेक्षा है।
अपने संबोधन के माध्यम से मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने युवा विधि स्नातकों को संदेश दिया कि पेशेवर सफलता के साथ ईमानदारी, निष्पक्षता, साहस और मानवीय गरिमा का सम्मान भी उतना ही महत्वपूर्ण है।









