लाडनूं : सम्पूर्ण भारत में नवरात्र में शक्ति की आराधना की जा रही है तो वहीं जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा के प्रणेता, अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में नौ दिवसीय आध्यात्मिक अनुष्ठान का प्रयोग चल रहा है। प्रतिदिन आचार्यश्री के द्वारा चतुर्विध धर्मसंघ को इस अनुष्ठान के अंतर्गत निर्धारित मंत्रों आदि के जप का प्रयोग कराया जा रहा है। इससे जुड़कर चतुर्विध धर्मसंघ मानों अपने भीतर आध्यात्मिक चेतना के जागरण का सार्थक प्रयास कर रहा है।
नित्य की भांति सोमवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आध्यात्मिक अनुष्ठान के अंतर्गत पहले मंत्रों के जप का प्रयोग कराया तदुपरान्त आज के निर्धारित विषय ‘मुक्ति से क्या मिलेगा’ को आगम के माध्यम से विश्लेषित करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया कि मुक्ति से क्या मिलेगा? मुक्ति को तो सामान्यतया हम मोक्ष के संदर्भ में देख सकते हैं। वह पूर्ण मुक्ति होती है। यहां मुक्ति लोभ के संदर्भ में है। लोभ से मुक्त हो जाना अर्था निर्लोभ हो जाना। लोभ मुक्त हो जाने से जीव को क्या प्राप्त होता है? आठ कर्मों में एक है मोहनीय कर्म जो सेनापति जैसा कर्म है। एक महोनीय कर्म क्षीण हो जाए तो शेष कर्म जो इसी जन्म में जाने वाले ही होते हैं। कर्मों का सम्राट मोहनीय कर्म होता है। अध्यात्म की साधना का गहरा संबंध मोह विजय से है। मोहनीय कर्म की 28 प्रकृतियां बताई गई हैं।
बताया गया कि लोभ से मुक्त होने से जीव आकिंचन्य को प्राप्त कर लेता है। लोभ होता है तो आदमी के भीतर संग्रह की भावना होती है। वह हर चीज को लोभवश अपने पास रखने का प्रयास करता है। आदमी लोभ के वशीभूत होकर ही संग्रह की प्रवृत्ति में संलग्न हो जाता है। आकर्षण, लोभ होता है तो आदमी अनेक वस्तुओं का संग्रह कर सकता है। जो साधु हैं, चारित्रात्माएं हैं, उनका जीवन तो अकिंचन है, उन्हें लोभ से बचने का प्रयास करना चाहिए। जो अकिंचन होता है, वह तीन लोक का अधिपति बन जाता है। गृहस्थों के पास परिग्रह होता है। किसी के पास पांच फैक्ट्री, किसी के पास चार बंगला, तो किसी के पास पांच, दस, बीस करोड़ होता है तो वह उतने का ही मालिक है, लेकिन अकिंचन साधु कहीं भी जाता है तो उसे कहीं कोई भी मकान, कोई स्थान आदि मिल जाता है तो मानों एक दृष्टि से तीनों लोकों का स्वामी हो सकता है।
साधु-साध्वियों ने घर-परिवार का त्याग कर दिया है। साधु अपरिग्रही हो जाता है। साधु के भीतर भी परिग्रह के प्रति कोई मोह और आकर्षण नहीं होना चाहिए। संन्यास जैसी अमूल्य धरोहर है, वह गृहस्थों के पास कहां प्राप्त हो सकता है। निर्लोभता के द्वारा अपनी साधुता को पुष्ट बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। साधु का आकिंचन्य निर्मल बना रहे, यह काम्य है।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में आयोजित दूसरे सघन साधना शिविर के समापन का मंचीय उपक्रम रहा। यह शिविर इस योगक्षेम वर्ष में दूसरी बार आयोजित हुआ। इस शिविर में 25 महिला शिविरार्थी व 13 पुरुष शिविरार्थी संभागी बने। इसके मंचीय उपक्रम के दौरान श्री डूंगरचंद सालेचा ने शिविर से संदर्भित जानकारी प्रस्तुत की। शिविर के बालकों ने गीत का संगान किया। शिविरार्थी रिया डोसी ने अपने शिविर के अनुभवों को अभिव्यक्ति दी। तदुपरान्त शिविर की संभागी बालिकाओं ने गीत का संगान किया। श्रीमती मधु देरासरिया ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी।
युवाचार्यश्री ने सघन साधना शिविर के शिविरार्थियों को उद्बोधित किया। तदुपरान्त युगप्रधान अनुशास्ता ने शिविरार्थियों को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि इस शिविर का उपक्रम कुछ वर्षों से चल रहा है। योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत अनेक शिविर के आयोजन निर्धारित हैं। सघन साधना जीवन में होती है तो इसका असर आगे भी बना रहे। घर में जाने के बाद भी संस्कारों में अच्छाई दिखाई दे, ऐसा प्रयास होना चाहिए। युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी व साध्वीवर्या इससे जुड़े हुए हैं। खूब अच्छा विकास होता रहे। बेंगलुरु सभा के अध्यक्ष श्री प्रकाश बाबेल ने अपनी अभिव्यक्ति दी। बेंगलुरु ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने पच्चीस बोल पर आधारित अपनी प्रस्तुति दी। संयोजिका नीता गादिया ने अपनी अभिव्यक्ति दी। पंचपरमेष्ठी गीत को भी प्रस्तुति दी गई। ज्ञानशाला की प्रशिक्षिकाओं ने भी अपनी प्रस्तुति दी। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। आज राजस्थान के लोकगायक श्री छोटूसिंह रावणा आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में पहुंचकर पावन आशीर्वाद प्राप्त किया।









