असार संसार में कोई किसी का नाथ नहीं : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण


लाडनूं : जन-जन के मानस को आध्यात्मिक सिंचन प्रदान करने वाले, जन-जन में सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की अलख जगाने वाले, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शुक्रवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘अनाथ भी बने सनाथ’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि इस दुनिया में किसी को नाथ भी माना जाता है। नाथ होता है तो आदमी अपने आपको सनाथ समझ सकता है। जिसका कोई नाथ नहीं होता, उन्हें अनाथ कहा जाता है। दुनिया में कई स्थानों पर अनाथ बच्चों के रहने के स्थान आदि भी देखने-सुनने में आ सकते हैं। सापेक्ष बात है कि अनाथ कहना और सनाथ कहना भी किसी अपेक्षा से सही हो सकता है। अनेक संदर्भ हो सकते हैं। कोई बात किस अपेक्षा से कही जा रही है, वह दृष्टिकोण अनुमानित हो जाए तो कोई बात सही भी लग सकती है। एक परिप्रेक्ष्य में कोई बात सही तो दूसरे परिप्रेक्ष्य में वह बात गलत भी हो सकती है।

आदमी की वृत्ति अच्छी हो, उसमें ठगने का भाव न हो, दृष्टिकोण यथार्थग्राही हो। इस संसार में आदमी की यह अनाथता है कि कोई भी किसी की वेदना को कम नहीं कर सकता, क्योंकि कर्म कर्ता का ही अनुगमन करते हैं। कहने को परिवार है, भाई हैं, संबंधी हैं, बेटा है, और भी कोई मित्र दोस्त आदि हो सकते हैं, किन्तु किए हुए कर्मों का फल आदमी को स्वयं भोगना होता है। उसके कष्टों को उसे स्वयं ही सहन करना होता है। वेदना में किसी को कोई त्राण नहीं दे सकता, यह जीव की इस धरा पर अनाथता है। इसलिए एक परिप्रेक्ष्य में यह बात स्पष्ट है कि सभी इस दृष्टि से अनाथ हैं। जीव को मृत्यु से बुढ़ापे से कौन बचा सकता है। बीमारी में एक बार कोई चिकित्सा करा दे, डॉक्टर को दिखा दे, वहां तक तो संबंधीजन कर भी सकें, लेकिन एक स्थिति के बाद तो डॉक्टर भी अपने हाथ खड़े कर लेता है। इस प्रकार इस असार संसार में कोई किसी का नाथ नहीं हो सकता।

जिसने अपने जीवन में साधुता का जीवन स्वीकार कर लिया, संयममय जीवन हो गया, अपनी ओर से अहिंसा का पालक बन गया तो कितने जीवों का वह नाथ बन सकता है। आदमी को अपने धर्म, गुरु व ईश्वर को अपना नाथ बनाने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में एक गीत का आंशिक संगान किया।

आचार्यश्री ने आगे कहा कि अध्यात्म की दृष्टि से अपने प्रभु को अपना नाथ बना ले तो वह सनाथ हो सकता है। अपने प्रभु को नाथ बनाकर कोई भी सनाथ हो सकता है।

आचार्यश्री ने कहा कि आज श्रुत पंचमी है। हमारे बहुश्रुत परिषद के संयोजक मुख्यमुनि महावीर हैं। इनके इस देह का जन्मदिन है। आज इन्हें 38 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। मुख्यमुनि अभी तरुणावस्था में है। अच्छी साधना, श्रुत की आराधना व संघीय सेवा होता रहे। शरीर स्वस्थ रहे, खूब अच्छे ढंग से विकास होता रहे। संतवृंद ने मुख्यमुनिश्री के जन्मदिन के संदर्भ में गीत का संगान किया।

वहीं सुधर्मा सभा में आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में मुख्यमुनिश्री द्वारा भिखु जश रसायण के वाचन का क्रम भी निरंतर जारी है। मुख्यमुनिश्री द्वारा सुमधुर संगान व व्याख्यान से लोग लाभान्वित हो रहे हैं। इससे संदर्भित चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को भी मुख्यमुनिश्री ने उत्तरित किया।

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