समता की साधना ही सच्चा धर्म: मुनि श्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ का आध्यात्मिक संदेश


जयपुर : मानसरोवर स्थित रजत पथ पर श्री विनोद कुमार जैन (गाडोली वाले) के निवास स्थान पर दो दिवसीय प्रवास के दौरान मुनि श्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ एवं मुनि श्री संभव कुमार जी के सानिध्य में भव्य आध्यात्मिक प्रवचन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर जैन समाज के अनेक श्रावक-श्राविकाओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता दर्ज कराई।

प्रवचन में मुनि श्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने समता धर्म के गूढ़ तत्वों को स्पष्ट करते हुए कहा कि “प्रतिक्रिया मुक्त रहना समता की साधना का एक महत्वपूर्ण प्रयोग है।” उन्होंने कहा कि कर्मबंधन से मुक्ति के लिए जीवन में अक्रिया और प्रतिक्रिया रहित अवस्था को साधना अत्यंत आवश्यक है। उनके अनुसार प्रतिक्रिया से मुक्त रहना केवल मानसिक स्थिति नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक अनुशासन है।

मुनि श्री ने आगे कहा कि “प्रतिक्रिया मुक्त रहना भी धर्म है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि तपस्या से जहाँ कर्मों का निर्जरण होता है, वहीं प्रतिक्रिया रहित जीवन जीना भी किसी कठोर तपस्या से कम नहीं है। यह अवस्था आत्मा को स्थिरता और शांति प्रदान करती है तथा समता की ओर अग्रसर करती है।

इसी क्रम में मुनि श्री संभव कुमार जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि धर्म का सार समता में निहित है। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति के कर्म समतामय हो जाते हैं, तभी जैन धर्म की सर्वोच्च शिक्षा का वास्तविक पालन होता है। ऐसी जागरूक साधना ही आत्मकल्याण का सशक्त मार्ग है।

कार्यक्रम के पश्चात दोनों मुनिद्वय ने दोपहर बाद रजत पथ से विहार करते हुए किरण पथ स्थित श्रीमान ज्ञानचंद दुनीवाल (पूर्व अध्यक्ष, महावीर भवन स्थानक) के निवास पर प्रवेश किया। वहाँ रात्रिकालीन प्रवास एवं प्रवचन कार्यक्रम का आयोजन भी संपन्न हुआ।

इस आध्यात्मिक आयोजन ने उपस्थित श्रद्धालुओं को समता, संयम और आत्मचिंतन के मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा प्रदान की।

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