नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़ी कॉलेजियम प्रणाली पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए यह स्पष्ट किया है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम द्वारा की जाने वाली सिफारिशें न तो सूचना के अधिकार (RTI) कानून के पूर्ण दायरे में आती हैं और न ही इन्हें सामान्य न्यायिक समीक्षा के तहत परखा जा सकता है।
अदालत के अनुसार, कॉलेजियम द्वारा बनाई गई सिफारिशें “मत निर्माण” (opinion formation) की प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं। इसमें किन तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार किया गया, इसे सार्वजनिक जांच या अदालत की समीक्षा का विषय नहीं बनाया जा सकता। हालांकि, जज पद के लिए किसी व्यक्ति की पात्रता से जुड़े तथ्यात्मक पहलुओं की जांच संभव है, लेकिन अंतिम चयन का निर्णय न्यायपालिका के आंतरिक विवेक पर आधारित माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया के कुछ हिस्सों को गोपनीय रखना आवश्यक है। अदालत ने कहा कि यदि कॉलेजियम की आंतरिक चर्चाओं और विचार-विमर्श को पूरी तरह सार्वजनिक जांच के दायरे में लाया जाता है, तो इससे न्यायिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
यह मामला न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और न्यायिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर चल रही बहस के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत में कॉलेजियम प्रणाली तीन न्यायाधीशों के मामलों (1981, 1993 और 1998 के फैसलों) के बाद विकसित हुई थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति वरिष्ठ न्यायाधीशों की सिफारिशों पर आधारित होती है।
गौरतलब है कि कॉलेजियम प्रणाली लंबे समय से पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर चर्चा में रही है, जबकि न्यायपालिका लगातार यह रेखांकित करती रही है कि नियुक्ति प्रक्रिया में उसकी स्वतंत्रता सर्वोपरि है।


