विवेक ही धर्म का मूल है, वही जीवन की श्रेष्ठ कला: मुनिश्री तत्त्व रुचि जी तरुण


जयपुर : मानसरोवर स्थित पद्मावती पोरवाल भवन में रविवार को जयपुर पोरवाल समाज द्वारा मासिक जप अनुष्ठान एवं आध्यात्मिक प्रवचन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ एवं मुनिश्री संभव कुमार जी के सान्निध्य में आयोजित कार्यक्रम में 300 से अधिक श्रद्धालु भाई-बहिनों ने भाग लिया।

कार्यक्रम के दौरान आचार्य महाश्रमण जी के शिष्य संतों ने “धर्म और जीने की कला” विषय पर प्रवचन देते हुए कहा कि धर्म का वास्तविक आधार विवेक है। उन्होंने कहा कि विवेक के बिना की गई धार्मिक क्रियाएँ भी अधर्म का रूप ले सकती हैं। विवेक को जीवन की सर्वोपरि कला बताते हुए संतों ने कहा कि यही मनुष्य को पशु से अलग करता है। पशु में जहाँ विवेक का अभाव होता है, वहीं मनुष्य की पहचान उसकी विवेकशीलता से होती है।

मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने अपने प्रवचन में कहा कि आज के शिक्षा-प्रधान युग में भी विवेक का स्तर लगातार गिरता जा रहा है, जो चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि विवेक की कमी केवल आध्यात्मिक जीवन ही नहीं, बल्कि सामाजिक और व्यवहारिक जीवन में भी अनेक समस्याएँ उत्पन्न करती है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे अपने विवेक को जागृत कर जीवन को अधिक संतुलित और कलात्मक बनाएं।

वहीं मुनिश्री संभव कुमार जी ने कहा कि यदि मनुष्य अपने प्रत्येक कार्य में विवेक का पालन करे तो वह अनावश्यक कर्म-बन्धनों से बच सकता है। उन्होंने भगवान महावीर के उपदेशों का उल्लेख करते हुए कहा कि बोलने, चलने, खाने-पीने, उठने-बैठने और सोने जैसी दैनिक क्रियाओं में भी विवेक का पालन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विवेक न केवल रक्षा कवच है, बल्कि सफलता का आधार भी है। विवेक से ही विद्या शोभायमान और फलवान बनती है तथा परिवार और समाज में शांति एवं संतुलन स्थापित होता है।

इस अवसर पर अखिल भारतीय पोरवाल समाज के महामंत्री श्री मुकेश जैन, जयपुर पोरवाल समाज के अध्यक्ष श्री पवन जैन, मंत्री श्री जितेश जैन, श्री रमेश जैन, श्री निर्मल जैन तथा तेरापंथ महिला मंडल (शहर) की मंत्री श्रीमती पायल जैन सहित अनेक गणमान्य जनों ने संतों का स्वागत करते हुए अपने विचार व्यक्त किए।

कार्यक्रम में तेरापंथ ज्ञानशाला की प्रशिक्षिकाओं द्वारा स्वागत गीत प्रस्तुत किया गया, जबकि ज्ञानार्थियों ने अपने कंठस्थ ज्ञान की प्रभावशाली प्रस्तुतियाँ दीं। बच्चों ने मुनिश्री से विभिन्न प्रश्न पूछे, जिनका उन्होंने सरल एवं सटीक उत्तर दिया। कार्यक्रम के अंत में परीक्षा में उत्तीर्ण शिक्षार्थियों को पारितोषिक देकर सम्मानित किया गया।

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