आत्म निंदा से पश्चाताप का भाव होता है उत्पन्न : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जन-जन को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति का संदेश प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘निन्दा से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से विवेचित करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया कि निन्दा करने से जीव क्या प्राप्त करता है? निन्दा दो रूपों में होती है। दूसरों की निंदा करना तो एक पाप है। जो अठारह पापों में एक पाप है।
किसी के विषय में प्रतिकूल बात हो और वह बात सही है तो उसे बताना चाहिए। आदमी कोई भी प्रवृत्ति करता है तो उसके पीछे उसका भाव कैसा वह महत्त्वपूर्ण बात होती है। गुस्से में आकर किसी के बाल खींचना पाप का कार्य हो जाता है और एक हमारे संत साधुचर्या के निर्वाह के लिए बड़े ही अच्छे भाव से लोच करते हैं तो दोनों के भावों में बहुत अंतर हो जाता है, जिसके कारण परिणाम भी परिवर्तित हो जाता है। लोच करना तो मानों एक सेवा का कार्य हो जाता है।
निंदा में भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी को बदनाम करने की भावना न हो, लेकिन सच्चाई हो तो उसे बताना भी आवश्यक हो जाता है। नहीं बताने से भी कुछ गड़बड़ी की बात हो सकती है। सच्ची बात यदि परिष्कार की दृष्टि से कही जाए तो वह बुरी बात नहीं होती। बोलने और न बोलने में विवेक होना आवश्यक होता है। सच्चाई भी कहां बताना और कहां नहीं बताना, इसमें भी विवेक रहना चाहिए। शिकायत करने वाले और जिसकी शिकायत हो रही है, दोनों की बातों को सुनने के बाद अपनी बात रखने का प्रयास होना चाहिए। न्याय के क्षेत्र में यह स्पष्ट बात होनी चाहिए कि किसी बेगुनाह को दण्ड न मिले। जल्दीबाजी में किसी निर्दोष को सजा मिल जाए, यह बुरी बात होती है। दोष निकालने वाले तो किसी में भी दोष निकाल सकते हैं, लेकिन न्याय की व्यवस्था देखने वाले को इस बात ध्यान रखना चाहिए कि किसी के साथ अन्याय न हो। जहां न्याय की बात हो, वहां छोटा, बड़ा, ज्ञानी, अज्ञानी आदि बातें नहीं होनी चाहिए, न्याय की व्यवस्था निष्पक्ष होनी चाहिए। न्याय तो मानों मौलिक अधिकार है। न्याय के आसन पर बैठने वाला तो मानों भगवान के रूप में बैठे और न्याय करे। न्याय करने वाले में निर्भीकता होनी चाहिए। जिसके मन में भय हो जाए तो उसके न्याय में भी समस्या हो सकती है। न्याय देने वाले निष्पक्षता होनी चाहिए तथा न्याय देने वाले में निर्लोभता होनी चाहिए।
अपनी गलती पर निंदा करना या स्वयं के प्रति अनादर का भाव करने से वह आत्म निंदा हो जाती है तथा आत्म निंदा करने से पश्चाताप का भाव उत्पन्न होता है। निंदा करने से मानसिक ताप भी बढ़ता पश्चाताप से फिर विरक्ति का भाव भी जागृत हो सकता है, अब मुझे ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए।
गत दिनों आचार्यश्री द्वारा युवाचार्यश्री की नियुक्ति किए जाने के संदर्भ में नेपाल के पूर्व राष्ट्रपति श्री रामबरण यादव ने पत्र भेजकर बधाई देते हुए मंगलकामना की गई। इस पत्र का वाचन मुनि दिनेशकुमारजी ने किया। इस संदर्भ में आचार्यश्री ने उनके प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना की।