जयपुर : जीवन में धन, परिवार, यश और प्रतिष्ठा प्राप्त करना सहज हो सकता है, लेकिन धर्म के प्रति श्रद्धा, उसका श्रवण और आचरण का अवसर मिलना अत्यंत दुर्लभ है। मनुष्य जीवन की वास्तविक सार्थकता धर्मध्यान में है और जीवन में धर्मध्यान की भावना का जागृत होना जन्म-जन्मांतरों के सुकृत का परिणाम है। यह विचार मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने गुरुवार को मालवीय नगर स्थित अणुविभा केन्द्र के महाप्रज्ञ सभागार में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए।
‘मनुष्य जीवन की सार्थकता’ विषय पर प्रवचन करते हुए मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य जीवन प्राप्त होने के बाद धर्म का श्रवण, उस पर श्रद्धा और उसके अनुरूप आचरण—इन तीनों का संयोग मिलना अत्यंत दुर्लभ है। भगवान महावीर ने भी मनुष्य जीवन की इस दुर्लभता और धर्माराधना के महत्व को स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि सांसारिक उपलब्धियां जीवन को सुविधा दे सकती हैं, लेकिन जीवन को सार्थक दिशा धर्म ही प्रदान करता है।
मुनिश्री ने आगमवाणी का उल्लेख करते हुए कहा कि अरहंतों की स्तुति और स्मरण से दर्शन की विशुद्धि होती है और हमारा दृष्टिकोण सम्यक् बना रहता है। धर्माराधना में सम्यक्त्व का विशेष महत्व है। सम्यक्त्व से युक्त धार्मिक क्रिया का आध्यात्मिक लाभ कई गुना बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि संसार से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ने के लिए सम्यक्त्व आवश्यक है और उसकी शुद्धि एवं सुरक्षा के लिए अर्हत भक्ति महत्वपूर्ण साधन है।
धर्मसभा में मुनिश्री संभव कुमार जी ने कर्म सिद्धांत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कर्म का फल भोगे बिना उससे छुटकारा नहीं मिलता। कर्म अपने परिणाम के अनुसार इसी भव में अथवा परभव में फलित हो सकते हैं। इसलिए मनुष्य को अपने प्रत्येक कर्म के प्रति सजग रहना चाहिए।
कार्यक्रम में ‘भरत मुक्ति’ नामक गेय व्याख्यान का वाचन भी किया गया। इसके माध्यम से संदेश दिया गया कि किसी के कार्य में विघ्न-बाधा नहीं डालनी चाहिए, क्योंकि मनुष्य जैसा कर्म करता है, उसका परिणाम उसी के पास लौटकर आता है।
कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर कुंथु प्रभु की स्तुति से हुआ। प्रवचन के दौरान तत्त्वज्ञान, प्रेक्षाध्यान एवं प्रत्याख्यान सहित विभिन्न आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। अंत में मंगल मंत्र एवं मंगल घोष के साथ धर्मसभा का समापन हुआ।








