पाकिस्तान-सऊदी-तुर्की का ‘इस्लामिक NATO’ कितना मजबूत? नए रक्षा समझौते से बदलेगा समीकरण

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पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए नए रक्षा समझौते ने पश्चिम एशिया की बदलती रणनीतिक तस्वीर के बीच एक नई चर्चा को जन्म दिया है। तीनों देशों के बीच हुए समझौते में प्रावधान है कि किसी एक देश पर होने वाला सशस्त्र हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इसी वजह से इसे NATO के सामूहिक रक्षा सिद्धांत से जोड़कर देखा जा रहा है।

समझौते के तहत तीनों देश संयुक्त सैन्य अभ्यास के साथ थल, वायु और नौसेना के स्तर पर सहयोग बढ़ाएंगे। इसके अलावा रक्षा तकनीक के विकास, सैन्य उत्पादन और तकनीकी सहयोग को भी मजबूत करने पर जोर दिया जाएगा। इस व्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए सऊदी अरब में एक जनरल सेक्रेटेरिएट बनाए जाने की योजना है।

NATO से तुलना, लेकिन अंतर भी बड़ा

विशेषज्ञों के मुताबिक समझौते में सामूहिक सुरक्षा का प्रावधान NATO के अनुच्छेद-5 से मिलता-जुलता जरूर है, लेकिन इसे फिलहाल NATO जैसा सैन्य गठबंधन कहना जल्दबाजी होगी। NATO के पास दशकों पुराना साझा सैन्य ढांचा, कमांड व्यवस्था और सदस्य देशों के बीच गहरा सैन्य समन्वय है। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच ऐसा ढांचा अभी विकसित होना बाकी है।

तीनों देशों की सैन्य जरूरतें और रक्षा प्रणालियां भी अलग-अलग हैं। तुर्की NATO का सदस्य है और उसकी सैन्य व्यवस्था में पश्चिमी तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका है। पाकिस्तान की रक्षा व्यवस्था में चीनी हथियार और तकनीक का बड़ा योगदान है, जबकि सऊदी अरब लंबे समय से अमेरिकी हथियार प्रणालियों पर निर्भर रहा है। ऐसे में तीनों सेनाओं के बीच पूरी तरह तालमेल स्थापित करना आसान नहीं होगा।

साझा कमांड सबसे बड़ी चुनौती

विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी मजबूत सैन्य गठबंधन के लिए केवल राजनीतिक समझौता पर्याप्त नहीं होता। संयुक्त कमांड सिस्टम, सैन्य इंटरऑपरेबिलिटी, खुफिया जानकारी साझा करने की व्यवस्था और संकट के समय स्पष्ट कार्रवाई की रणनीति भी जरूरी होती है। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की को अब इसी दिशा में आगे बढ़ना होगा।

समझौते के तहत प्रस्तावित व्यवस्था में तीनों देशों के रक्षा और विदेश मंत्री तथा सेना प्रमुखों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की भूमिका को लेकर भी चर्चा है।

किसी देश के खिलाफ नहीं बताया समझौता

तीनों देशों ने इस समझौते को किसी विशेष देश के खिलाफ बने सैन्य गठबंधन के रूप में पेश नहीं किया है। सऊदी अरब की ओर से भी स्पष्ट किया गया है कि इसका उद्देश्य किसी सैन्य धुरी या सांप्रदायिक गुट का निर्माण करना नहीं है। इसके बावजूद क्षेत्रीय सुरक्षा और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच इस समझौते को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की मिलकर NATO जैसा कोई नया सैन्य संगठन बना रहे हैं। हालांकि, यह समझौता तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को निश्चित तौर पर एक नए स्तर पर ले जाता है। आने वाले समय में संयुक्त अभ्यास, सैन्य तकनीक और साझा सुरक्षा व्यवस्था में होने वाली प्रगति से ही इसकी वास्तविक ताकत का आकलन हो सकेगा।