सिडनी : ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र, खासकर हिंद महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर समय रहते रणनीतिक कदम उठाने की जरूरत पर जोर दिया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि चीन की बढ़ती मौजूदगी पर अभी ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में प्रभावी प्रतिक्रिया देने में देर हो सकती है।
इंडो-मेडिटेरेनियन डायलॉग्स में ऑनलाइन संबोधन के दौरान मॉरिसन ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया की भौगोलिक स्थिति उसे हिंद और प्रशांत महासागर, दोनों के रणनीतिक महत्व को समझने का विशिष्ट दृष्टिकोण देती है। उन्होंने कहा कि देश की आर्थिक संभावनाएं भी दोनों महासागरों से जुड़ी हैं।
मॉरिसन ने कहा कि ताइवान जलडमरूमध्य, दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में बढ़ते तनाव ने उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान ऑस्ट्रेलिया की रक्षा नीति को प्रभावित किया। इसी रणनीतिक सोच के तहत ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका के बीच AUKUS सुरक्षा साझेदारी बनी।
हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा पर पूरा ध्यान केंद्रित करने के कारण हिंद महासागर की रणनीतिक अहमियत को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार हिंद महासागर यूरोप, मध्य पूर्व और एशिया के बीच व्यापार, ऊर्जा, समुद्री केबल, डेटा और लॉजिस्टिक्स का महत्वपूर्ण मार्ग है।
मॉरिसन ने श्रीलंका, पाकिस्तान और म्यांमार में चीन की बढ़ती आर्थिक और रणनीतिक सक्रियता का उल्लेख करते हुए कहा कि बीजिंग की क्षेत्रीय मौजूदगी लगातार बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि चीन का निवेश भले ही शुरुआत में आर्थिक दिखाई देता हो, लेकिन दक्षिण चीन सागर का अनुभव बताता है कि ऐसी गतिविधियों के रणनीतिक प्रभाव आगे चलकर कहीं अधिक व्यापक हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि भारत चीन से उत्पन्न चुनौती को लेकर बेहद सजग है। खासतौर पर दोनों देशों के बीच व्यापार असंतुलन का उल्लेख करते हुए मॉरिसन ने कहा कि इस मुद्दे पर भारत की चिंता अमेरिका से भी अधिक हो सकती है।
AUKUS के भविष्य पर मॉरिसन ने कहा कि उन्हें उम्मीद नहीं है कि यह गठबंधन औपचारिक रूप से ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका से आगे बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि इसका पहला स्तंभ ऑस्ट्रेलिया की परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बी क्षमता विकसित करने और तीनों देशों की सामूहिक समुद्री क्षमता को मजबूत करने पर केंद्रित रहेगा।
उन्होंने पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में अमेरिकी पनडुब्बियों की रोटेशनल तैनाती को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार इससे हिंद महासागर में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बढ़ेगी और अमेरिकी रणनीतिक ध्यान केवल प्रशांत क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा।
मॉरिसन ने कहा कि AUKUS के दूसरे स्तंभ, यानी उन्नत रक्षा तकनीकों में सहयोग, के तहत अन्य देशों के साथ परियोजना-विशेष सहयोग की संभावनाएं बनी रह सकती हैं। उन्होंने जापान और संभावित रूप से दक्षिण कोरिया का नाम लिया। भारत के साथ सहयोग की संभावना से भी उन्होंने इनकार नहीं किया, हालांकि उनका कहना था कि फिलहाल न तो नई दिल्ली इसकी मांग कर रही है और न ही वॉशिंगटन की ओर से ऐसी कोई पेशकश दिखाई देती है।
मॉरिसन ने कहा कि AUKUS का व्यापक उद्देश्य किसी देश को निशाना बनाना नहीं, बल्कि रणनीतिक प्रतिरोध और संतुलन कायम करना है, ताकि हिंद-प्रशांत के देश बिना दबाव या धमकी के आर्थिक विकास और समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ सकें।
उन्होंने भारत की बढ़ती रणनीतिक, आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक ताकत को हिंद-प्रशांत में शक्ति संतुलन के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया। मॉरिसन के अनुसार क्षेत्रीय व्यवस्था अब अधिक बहुध्रुवीय और वितरित होती जा रही है, जिसमें भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है।
उन्होंने कहा कि क्वाड में भारत की मौजूदगी इस समूह को विशिष्ट रणनीतिक महत्व देती है। चीन के हिंद और प्रशांत महासागरों में बढ़ते प्रभाव के बीच भारत क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।








