फांसी की जगह घातक इंजेक्शन की मांग खारिज, सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

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डेस्क : मृत्युदंड पाने वाले दोषियों को फांसी देने के बजाय कम पीड़ादायक तरीके से मौत की सजा देने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने फांसी की मौजूदा व्यवस्था को हटाने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में नए वैज्ञानिक या चिकित्सकीय प्रमाण सामने आने पर इस मुद्दे की दोबारा समीक्षा की जा सकती है।

फांसी की संवैधानिक वैधता बरकरार

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि फांसी को मृत्युदंड देने का असंवैधानिक तरीका घोषित करने के लिए फिलहाल पर्याप्त आधार नहीं है। पीठ ने 1983 के ‘दीना बनाम भारत संघ’ मामले में संविधान पीठ के फैसले को बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग भी स्वीकार नहीं की।

मौजूदा कानून के तहत मृत्युदंड को फांसी के जरिए लागू करने का प्रावधान है। याचिकाकर्ता ने इसी व्यवस्था को चुनौती देते हुए इसे पीड़ादायक और अमानवीय बताया था।

इंजेक्शन समेत इन तरीकों का दिया गया था सुझाव

याचिका में फांसी के स्थान पर ऐसे तरीकों को अपनाने की मांग की गई थी, जिनमें कथित तौर पर कम पीड़ा हो। इनमें अंतःशिरा घातक इंजेक्शन, गोली मारकर मौत, बिजली का झटका और गैस चैंबर जैसे विकल्प शामिल थे। याचिका में दलील दी गई थी कि मृत्युदंड को ऐसी प्रक्रिया के जरिए लागू किया जाना चाहिए जिससे अनावश्यक पीड़ा और तकलीफ कम हो।

केंद्र सरकार चाहे तो विशेषज्ञ समिति बना सकती है

सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि भविष्य के लिए रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया है। अदालत ने कहा कि यदि केंद्र सरकार चाहे तो मृत्युदंड लागू करने के वैकल्पिक तरीकों का व्यापक अध्ययन करने के लिए विशेषज्ञों की समिति गठित कर सकती है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि मौजूदा याचिका खारिज होने का अर्थ यह नहीं है कि वैज्ञानिक और चिकित्सकीय प्रगति के आधार पर भविष्य में इस व्यवस्था की समीक्षा नहीं हो सकती।

जनवरी में सुरक्षित रखा था फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई पूरी करने के बाद जनवरी 2026 में फैसला सुरक्षित रखा था। याचिका में वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने मृत्युदंड देने के तरीके के तौर पर फांसी को चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि फांसी के दौरान दोषी को लंबे समय तक दर्द और पीड़ा का सामना करना पड़ सकता है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भारत में मृत्युदंड को लागू करने का मौजूदा तरीका फांसी ही बना रहेगा, हालांकि भविष्य में वैज्ञानिक और चिकित्सकीय प्रमाणों के आधार पर वैकल्पिक तरीकों पर विचार की संभावना खुली रखी गई है।