जयपुर : अणुविभा केन्द्र, मालवीय नगर में बुधवार को मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ के सान्निध्य में ‘स्तव और स्तुति—क्यों, किसकी और किसलिए’ विषय पर प्रेरक आध्यात्मिक प्रवचन हुआ। धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने कहा कि महापुरुषों की भक्ति में किया गया स्तव-स्तुति केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि उनके प्रति कृतज्ञता और बहुमान की अभिव्यक्ति है। इससे व्यक्ति के भीतर का अहंकार क्षीण होता है और विनम्रता का विकास होता है।
मुनिश्री ने भगवान महावीर स्वामी और गणधर गौतम स्वामी के संवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि स्तव और स्तुति के माध्यम से व्यक्ति ज्ञान, दर्शन और चारित्र की बोधि प्राप्त करता है। यह बोधि प्राप्त होने पर साधक मोक्ष की दिशा में अग्रसर होता है अथवा उच्च गति को प्राप्त करता है।
उन्होंने कहा कि आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि व्यक्ति जिस प्रकार के विचार, चिंतन और भावनाओं को निरंतर धारण करता है, उसके व्यक्तित्व में उसी प्रकार के गुण विकसित होने लगते हैं। इसलिए आत्मज्ञानी महापुरुषों के गुणों का गुणगान और उनके प्रति बहुमान की भावना रखने से उन गुणों को अपने जीवन में उतारने की प्रेरणा मिलती है।
मुनिश्री संभव कुमार जी महाराज ने कहा कि ज्ञानियों का गुणोत्कीर्तन करने से ज्ञान पर पड़े आवरण दूर होने लगते हैं और साधक धीरे-धीरे ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ता है। उन्होंने कहा कि ज्ञानियों की आशातना ज्ञान की प्राप्ति में बाधक बनती है। इसलिए ज्ञान के विकास के लिए ज्ञान और ज्ञानी के प्रति सदैव बहुमान का भाव रखना चाहिए। जैन दर्शन में प्रतिक्रमण के आवश्यक सूत्रों में अरिहंत, सिद्ध और आचार्य के स्तव-स्तुति का विधान भी इसी भावना को पुष्ट करता है।
कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर पार्श्वनाथ की स्तुति से हुआ। इसके बाद तत्त्वज्ञान, प्रेक्षाध्यान और जप-अनुष्ठान का क्रम चला। गेय काव्य ‘भरत मुक्ति’ का रोचक विवेचन भी किया गया। मंगल मंत्र के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
तेरापंथ महिला मंडल (शहर) की अध्यक्षा श्रीमती कौशल्या जी जैन ने बताया कि 4 सितंबर को अणुविभा केन्द्र में सामूहिक आयंबिल का आयोजन किया जाएगा।








