त्याग से आत्मशुद्धि और कर्मबंधन से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है : मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’

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जयपुर : अणुविभा केन्द्र में मंगलवार को ‘प्रत्याख्यान अर्थात त्याग से जीव क्या प्राप्त करता है’ विषय पर चिंतन संगोष्ठी का आयोजन मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ एवं मुनिश्री संभव कुमार जी के सानिध्य में हुआ। संगोष्ठी में समाज के गणमान्य नागरिकों के साथ बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने सहभागिता की।

मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि प्रत्याख्यान संवर धर्म है और त्याग धर्म ही बंधन से मुक्ति तथा आत्मशुद्धि का मार्ग है। भगवान महावीर स्वामी की वाणी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्याख्यान के माध्यम से आश्रव अर्थात कर्मबंध के कारणों का निरोध होता है। जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं, प्रवृत्तियों और इंद्रियों पर संयम स्थापित करता है, तब आत्मा के विकास का मार्ग प्रशस्त होता है।

उन्होंने कहा कि आत्मसंयम धर्म का प्राण है। आत्मविकास के लिए व्यक्ति का अपने ऊपर नियंत्रण होना आवश्यक है। तत्त्वज्ञान की चर्चा करते हुए उन्होंने आश्रव तत्त्व का विस्तार से विवेचन किया। ‘भरत मुक्ति’ गेय व्याख्यान के माध्यम से तीर्थंकर भगवान के बाह्य व्यक्तित्व और उनके आध्यात्मिक आदर्शों को भी प्रस्तुत किया।

मुनिश्री संभव कुमार जी ने कहा कि धर्म का श्रवण और उसके मार्ग पर चलने का अवसर मिलना भी सौभाग्य की बात है। उन्होंने संयम की महत्ता बताते हुए कहा कि जीवन का वास्तविक अस्तित्व संयम से है। प्रकृति भी अपने संतुलन और संयम के कारण जीव-जगत के लिए संरक्षण का आधार बनती है, जबकि उसका संतुलन बिगड़ने पर वही विनाश का कारण बन सकती है।

उन्होंने कहा कि आज के तनावपूर्ण जीवन में शांति, समाधि और स्वस्थता के लिए संयम अत्यंत आवश्यक है। संयम केवल धार्मिक साधना नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, अनुशासित और सार्थक बनाने की जीवन-पद्धति है।

कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर अरिष्टनेमि भगवान की स्तुति से हुआ। इस अवसर पर साधकों को जप, तप और ध्यान के विभिन्न प्रयोग भी कराए गए। अनेक श्रावक-श्राविकाओं ने तेले तप का प्रत्याख्यान ग्रहण किया।

श्रीमती राजरानी जी ने जानकारी दी कि आगामी 23 अगस्त को जैन विद्या पर विशेष सेमिनार का आयोजन किया जाएगा। संगोष्ठी का संदेश यही रहा कि त्याग केवल किसी वस्तु या इच्छा को छोड़ना नहीं, बल्कि आत्मा को कर्मबंधन से मुक्त करने और भीतर की शुद्धता की ओर बढ़ने का संकल्प है।