व्यवदान से अक्रियता को प्राप्त कर सकता है जीव : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने रविवार को प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के लिए सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘निर्जरा से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया कर्म निर्जरा अर्थात् व्यवदान से क्या प्राप्त होता है। अध्यात्म की साधना में संवर और निर्जरा दो तत्त्व हैं। इन दोनों में ही सारे धर्म के क्रिया-कलापों का समावेश हो सकता है। संवर की साधना की बात आती है और तप और शुभ योग से उसे कर्म निर्जरा होती है, पूर्व कर्म का क्षय होता है।
कर्मों के क्षय होने का लाभ भी मिलता है। निर्जरा होने से जीव अक्रिया को उत्पन्न कर लेता है। साधु संवर की साधना करते-करते कर्मों की निर्जरा होती है और जब तक ज्ञानावरणीय और दर्शनावरणीय कर्मों का क्षय नहीं होता, तब तक अक्रिया की स्थिति नहीं आती। जब तक मोहनीय कर्म का क्षय नहीं होता, केवलज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। साधुत्व आ गया है और फिर कभी अष्टम गुणस्थान उपलब्ध हो जाए तो बहुत बड़ी बात हो सकती है। वर्तमान व्यवस्था में तो साधु को छठे और अधिक से अधिक सातवें गुणस्थान की प्राप्ति हो सकती है।
मानव जीवन प्राप्त होना, संज्ञी मनुष्य बन जाना और उसमें भी धर्म का मार्ग मिल जाना बहुत सौभाग्य की बात होती है। जो जीव चारित्र रत्न को प्राप्त कर ले, वह तो मानों धन्य बन जाता है। संवरयुक्त व्यवदान, निर्जरा हो तो कल्याण की बात हो सकती है। संवर की प्राप्ति हो जाए, चारित्र मिल जाए तो ज्यादा से ज्यादा निर्जरा हो सकती है। निर्जरा का अंतिम लक्ष्य तो मोक्ष है। जब तक जीव प्रवृत्ति में रहेगा, तब तक उसे मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती। अच्छी प्रवृत्ति के माध्यम से आदमी धीरे-धीरे निवृत्ति की ओर गति कर सकता है।
आदमी को असत् से सत् की ओर आने का प्रयास करना चाहिए, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरत्व की ओर गति करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को यथासंभव शुभ योग में रहने का प्रयास करना चाहिए। शुभ योग में रहने से भी कर्मों की निर्जरा होती है। इस प्रकार व्यवदान के द्वारा अक्रियता को प्राप्त करता है। जितना संभव हो सके, अशुभ योग की क्रियाओं से बचने का प्रयास करना चाहिए और शुभ योग में रहने का प्रयास करना चाहिए।