धन सुख-सुविधा दे सकता है, लेकिन त्राण और शरण नहीं : मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’

0

जयपुर :  मालवीय नगर स्थित अणुविभा केन्द्र के महाप्रज्ञ सभागार में रविवार को “संसार में शरण—धन या धर्म” विषय पर आयोजित आध्यात्मिक कार्यशाला में मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि धन व्यक्ति को सुख-सुविधाएं उपलब्ध करा सकता है, लेकिन जीवन में वास्तविक त्राण और शरण धन से प्राप्त नहीं हो सकती। इसके लिए धर्म और आत्मचिंतन का मार्ग अपनाना आवश्यक है।

समण संस्कृति संकाय एवं जैन विद्या के बैनर तले आयोजित कार्यकर्ता सम्मान समारोह तथा तेरापंथ युवक परिषद् की बारह व्रत कार्यशाला के समापन अवसर पर मुनिश्री ने कहा कि परिग्रह मनुष्य के भीतर मोह को जन्म देता है। मोह से अहंकार बढ़ता है और विलासिता का विस्तार होता जाता है। अंततः यही परिग्रह चित्त में संताप को जन्म देकर हिंसा, कलह और दुःख का कारण बनता है।

उन्होंने कहा कि जीवन में स्थायी सुख और शांति केवल धन-संपत्ति के संचय से नहीं, बल्कि त्याग, संयम और धर्म के आचरण से प्राप्त होती है। मनुष्य जितना बाहरी संग्रह में उलझता है, उतना ही वह अपनी आंतरिक शांति से दूर होता जाता है।

अति संग्रह से बचना आवश्यक : मुनिश्री संभव कुमार

मुनिश्री संभव कुमार जी ने कहा कि जीवन सीमित है, इसलिए अल्पकालिक जीवन के लिए अत्यधिक संग्रह उचित नहीं है। उन्होंने कर्म और उसके परिणामों की व्याख्या करते हुए कहा कि कर्मकर्ता ही उसके फल का भोक्ता होता है। दुष्कर्म के फल में कोई दूसरा भागीदार नहीं बन सकता। इसलिए जीविकोपार्जन करते समय अनैतिकता और पाप प्रवृत्तियों से बचना चाहिए।

कार्यक्रम के दौरान प्रश्नोत्तर का क्रम भी हुआ। इसके साथ तत्त्वज्ञान तथा ‘भरत मुक्ति’ विषय पर व्याख्यान सहित विभिन्न आध्यात्मिक उपक्रम आयोजित किए गए।

कार्यकर्ताओं एवं सहयोगी संस्थाओं का सम्मान

समण संस्कृति संकाय की ओर से कार्यक्रम में सहयोग देने वाली संस्थाओं एवं कार्यकर्ताओं का मोमेंटो भेंट कर तथा दुपट्टा ओढ़ाकर सम्मान किया गया। इस अवसर पर जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा के मुख्य ट्रस्टी श्री आलोक जी हीरावत, अध्यक्ष श्री शांतिलाल जी गोलछा, तेरापंथ महिला मंडल शहर एवं सी-स्कीम की अध्यक्षा-मंत्री क्रमशः श्री कौशल्या जी जैन, श्रीमती कनक जी आंचलिया, श्रीमती पायल जी एवं श्रीमती राजश्री जी बाफना सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

जैन विद्या के मार्गदर्शक श्री गणपत जी भंडारी, श्री कमलेश जी, श्री संदीप जी, श्री रौनक जी, श्री राहुल जी, मंच संचालिका श्रीमती सरिता जी तथा दीर्घकालीन सहयोगी कार्यकर्ता श्रीमती सीमा जी, श्री शशी जी, श्री धर्मा जी आदि ने भी जैन विद्या एवं उसके जीवनोपयोगी महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए।

‘श्रावक व्रत धारो’ गीत के साथ हुआ समापन

बारह दिवसीय बारह व्रत कार्यशाला का समापन ‘श्रावक व्रत धारो’ गीत के साथ हुआ। कार्यशाला के माध्यम से श्रावक जीवन में संयम, मर्यादा, त्याग और आत्मानुशासन के महत्व को समझाने का प्रयास किया गया। कार्यक्रम का संदेश यही रहा कि धन जीवन की आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है, लेकिन आत्मा को शांति, सुरक्षा और वास्तविक आश्रय धर्म के मार्ग से ही प्राप्त होता है।