महंगा कच्चा तेल, सस्ता पेट्रोल-डीजल: सरकारी तेल कंपनियों को रोज ५३० करोड़ की चपत

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डेस्क : अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के बीच देश की सरकारी तेल विपणन कंपनियों पर आर्थिक दबाव बढ़ गया है। रेटिंग एजेंसी इक्रा के अनुसार, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम को मौजूदा परिस्थितियों में पेट्रोल की बिक्री पर करीब ८ रुपये और डीजल पर करीब ९ रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है।

इक्रा के अनुमान के मुताबिक, तीनों कंपनियों का संयुक्त दैनिक नुकसान करीब ५३० करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतें फिलहाल स्थिर हैं, जबकि कच्चे तेल की लागत में लगातार बढ़ोतरी हुई है। इससे कंपनियों के लाभ पर दबाव बढ़ रहा है।

११७.४ डॉलर प्रति बैरल पहुंचा कच्चा तेल

भारत जिस कच्चे तेल की टोकरी का आयात करता है, उसकी कीमत २१ सितंबर को बढ़कर ११७.४ डॉलर प्रति बैरल हो गई। वित्त वर्ष २०२५-२६ में इसका औसत करीब ६६ डॉलर प्रति बैरल था। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के पीछे पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियां प्रमुख कारण मानी जा रही हैं।

घरेलू गैस पर भी बढ़ा दबाव

तेल कंपनियों के लिए घरेलू रसोई गैस भी चिंता का विषय बनी हुई है। इक्रा के अनुसार, सितंबर में घरेलू एलपीजी के एक सिलेंडर पर करीब ३०० रुपये की अंडर-रिकवरी हो रही है। ३० जून २०२६ तक घरेलू एलपीजी से जुड़ा संचयी नकारात्मक बफर करीब ६१,९४० करोड़ रुपये पहुंच चुका था।

हालांकि, रिफाइनिंग मार्जिन फिलहाल पूरी तरह कमजोर नहीं हुए हैं। इक्रा के मुताबिक, पश्चिम एशिया संकट शुरू होने के बाद से सिंगापुर ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन १० डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है। इसके बावजूद महंगे कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की ऊंची लागत से तेल कंपनियों के मुनाफे और नकदी प्रवाह पर दबाव बढ़ सकता है।

इक्रा का कहना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं और घरेलू ईंधन की कीमतों में बदलाव नहीं होता, तो तेल कंपनियों को अपनी कार्यशील पूंजी की जरूरत पूरी करने के लिए अधिक अल्पकालिक कर्ज लेना पड़ सकता है।