डेस्क : चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर बुधवार को राजनीतिक विवाद और गहरा गया। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के साथ-साथ उनके खिलाफ महाभियोग चलाने और गिरफ्तारी की मांग विपक्षी नेताओं ने उठाई। यह विवाद चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा चुनाव आयोग के कुछ फैसलों पर कथित तौर पर आपत्ति दर्ज किए जाने से जुड़ी रिपोर्ट के बाद सामने आया है।
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग चलाने की मांग की। वहीं आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल और शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने उनकी गिरफ्तारी और पद से हटाने की मांग की। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी की मांग करते हुए राज्य में 2026 के विधानसभा चुनाव दोबारा कराने की मांग उठाई।
विवाद की मुख्य वजह एक रिपोर्ट है, जिसमें दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार मतदाता सूची प्रबंधन और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े फैसलों तथा आदेशों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराईं। रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने, फॉर्म-6 में बदलाव तथा मतदाता डेटा के प्रबंधन से जुड़े मुद्दे शामिल थे।
अरविंद केजरीवाल ने एसआईआर प्रक्रिया को रद्द करने और इसके तहत किए गए बदलावों को वापस लेने की मांग की। उन्होंने पुरानी मतदाता सूची बहाल करने की भी मांग रखी। उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में हुए पिछले विधानसभा चुनावों को रद्द कर दोबारा चुनाव कराने की मांग की।
उधर, चुनाव आयोग की ओर से इन दावों का खंडन किया गया है। आयोग के सूत्रों के अनुसार, विचार-विमर्श के दौरान मतभेद होना संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है और एसआईआर सहित आयोग के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने अपने संवैधानिक दायित्व और स्थापित प्रक्रियाओं के तहत काम करने की बात कही है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, एसआईआर प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े फैसले को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। सत्तारूढ़ भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि चुनाव आयुक्तों के बीच अलग-अलग राय सामने आना आयोग की संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है।








