धर्म से प्रभावित रहे व्यवहार : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

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लाडनूं :जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में आज से अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह का शुभारंभ हुआ। इसके तहत 2 अक्टूबर को अहिंसा दिवस, 3 को सांप्रदायिक सौहार्द दिवस, 4 को पर्यावरण शुद्धि दिवस, 5 को नशामुक्ति दिवस, 6 को अनुशासन दिवस व 7 अक्टूबर को जीवन विज्ञान दिवस मनाया जाएगा। तेरापंथ धर्मसंघ के नवम अधिशास्ता आचार्यश्री तुलसी का अणुव्रत एक महनीय अवदान है। आचार्य तुलसी की जन्म स्थली लाडनूं में आचार्यश्री ने सान्निध्य में अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह होने से सकल समाज में भी उत्साह, उमंग का माहौल है। कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने अणुव्रत गीत का समूह गान किया।

सुधर्मा सभा में संबोधित करते हुए आचार्यश्री ने कहा – आदमी का व्यवहार धर्मार्जित और धर्म से प्रभावित होना चाहिए। चाहे कोई राजनीति में हो, व्यवसाय क्षेत्र में हो, नौकरी पेशा हो या शिक्षक-वकील हो, सभी क्षेत्रों के गृहस्थों का व्यवहार धर्म से प्रभावित होना चाहिए। जैसा व्यवहार व्यक्ति दूसरों के प्रति रखेगा, वैसा ही प्रतिफल व्यक्ति को मिल सकेगा। यदि हम मुस्कान और आत्मीयता के साथ मिलेंगे, तो सामने वाले के चेहरे पर भी खुशी झलकेगी। आगम वांग्मय में कहा गया है कि ज्ञानियों और तत्वज्ञों के आचरण के अनुसार हमारा व्यवहार हो चाहिए। जिससे आत्मा का हित हो सके।

आचार्यप्रवर ने अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के शुभारंभ के संदर्भ में कहा कि अणुव्रत प्रवर्तक आचार्यश्री तुलसी ने अणुव्रत को एक व्यापक रूप दिया ताकि जैन ही नहीं, अपितु गैर-जैन भी छोटे-छोटे नियमों को स्वीकार कर सकें। आज अणुव्रत सिर्फ तेरापंथ समाज तक सीमित न रहकर एक व्यापक मानवतावादी आंदोलन बन गया है। यह सप्ताह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग, विद्यार्थियों, शिक्षकों, न्यायालयों और जेलों तक पहुंचना चाहिए। गुरुदेव ने लाडनूं सहित सभी स्थानों पर साधु-साध्वियों और समणियों से इन सात दिनों में अधिक से अधिक जन-जागरण कार्यक्रम करने का आह्वान किया। इस अवसर पर सभा में उपस्थित विद्यार्थियों एवं जनसमूह ने अणुव्रत के संकल्पों को स्वीकार करते हुए सद्भाव पूर्ण व्यवहार करना, ईमानदारी का पालन करना और जीवन में शराब व नशीले पदार्थों से दूर रहने की प्रेरणा प्राप्त की।

कार्यक्रम में अणुव्रत विश्व भारती सोसाइटी के अध्यक्ष श्री प्रताप दुगड़ ने अपने विचार रखे।

श्री सुरेंद्र बरमेचा ने 31 दिन की तपस्या मासखमण का प्रत्याख्यान किया एवं श्री पिंकी सुराणा ने भी दसवें वर्षीतप में 31 की तपस्या का प्रत्याख्यान किया।