जयपुर : आज का जीवन भोग-विलास और निरंतर बढ़ती इच्छाओं के बीच तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में धर्म, अध्यात्म और संयम के प्रति श्रद्धा रखना स्वयं में एक सौभाग्य है। कार्य में सफलता भी तभी सार्थक होती है, जब उसके पीछे श्रद्धा, समर्पण और संयम की भावना हो। यह प्रेरक विचार मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने गुरुवार को मालवीय नगर स्थित अणुविभा केन्द्र में आयोजित ‘भोग बनाम त्याग’ विषयक विशेष कार्यशाला में व्यक्त किए।
मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने भोग और त्याग के जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को स्पष्ट करते हुए कहा कि अत्यधिक भोग ही अनेक रोगों और अशांति का कारण बनता है, जबकि तप, त्याग, संयम और वैराग्य व्यक्ति को भीतर से स्वस्थ एवं संतुलित बनाते हैं। उन्होंने कहा कि जीवन में वास्तविक सुख-शांति केवल बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखने और भोग-उपभोग में मर्यादा अपनाने से प्राप्त होती है।
उन्होंने कहा कि इच्छाएं जितनी बढ़ती जाती हैं, मन उतना ही अस्थिर होता जाता है। इसके विपरीत संयम व्यक्ति को आत्मिक शांति की ओर ले जाता है। इसलिए सुखी और संतुलित जीवन के लिए आवश्यक है कि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के बीच अंतर को समझे तथा जीवन में त्याग और संयम के लिए स्थान बनाए।
इस अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री संभव कुमार जी ने कहा कि तप और त्याग केवल व्यक्ति के जीवन को ही नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज और संसार को सुरक्षित रखने की शक्ति रखते हैं। भगवान महावीर के उपदेशों का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि संयम ही वास्तविक जीवन का आधार है, जबकि असंयम व्यक्ति और समाज दोनों के लिए अनेक समस्याओं का द्वार खोल देता है।
मुनिश्री संभव कुमार जी ने विश्व शांति के संदर्भ में संयम को महत्वपूर्ण सूत्र बताते हुए कहा कि जब मनुष्य अपनी इच्छाओं, क्रोध और कषाय पर नियंत्रण रखता है, तब परिवार से लेकर समाज तक शांति का वातावरण निर्मित होता है। इसके विपरीत असंयम ही कलह, कषाय, संघर्ष और अशांति को जन्म देता है।
कार्यक्रम का आयोजन तेरापंथ महिला मंडल (शहर) के तत्त्वावधान में किया गया। कार्यक्रम का आध्यात्मिक शुभारंभ तीर्थंकर स्तुति के साथ हुआ। इस अवसर पर महिला मंडल की मंत्री श्रीमती पायल जैन सहित बड़ी संख्या में मंडल की बहनें एवं गणमान्य समाजजन उपस्थित रहे।
कार्यशाला ने भोग और त्याग के बीच के अंतर को केवल जीवनशैली का विषय न मानकर आत्मिक शांति, सामाजिक सद्भाव और स्वस्थ जीवन से जोड़ते हुए उपस्थित जनों को संयमित जीवन की दिशा में प्रेरित किया।








