जयपुर : निर्माण नगर के अंतर्गत महाप्रज्ञ अंतरराष्ट्रीय विद्यालय के संबोधि सभागार में आयोजित धर्म सभा में आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि श्री तत्त्व रुचि जी “तरुण” ने कहा कि आत्म-रक्षा में ही सर्व-रक्षा निहित है। उन्होंने जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य आत्मा की रक्षा को बताया और कहा कि मनुष्य सामान्यतः शरीर और धन-संपत्ति की सुरक्षा के प्रति सजग रहता है, किंतु आत्मा की सुरक्षा के प्रति उसकी जागरूकता अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है, जबकि वास्तविक सुरक्षा वहीं से आरंभ होती है।
मुनि श्री ने कहा कि जिस प्रकार राष्ट्र की रक्षा के लिए सुरक्षा उपकरणों और तंत्रों की व्यवस्था की जाती है, शरीर की रक्षा के लिए सुरक्षा कर्मियों का सहारा लिया जाता है, और धन-संपत्ति की सुरक्षा के लिए मजबूत भवन, ताले और दरवाजों की व्यवस्था की जाती है, उसी प्रकार आत्मा की रक्षा के लिए भी विशेष साधना और संयम की आवश्यकता है। उन्होंने प्रश्न किया कि क्या हमने आत्मा की सुरक्षा के लिए भी कोई ठोस व्यवस्था की है? और स्पष्ट किया कि आत्मा की रक्षा का मार्ग संयम, साधना और आत्मानुशासन से होकर गुजरता है।
इस अवसर पर मुनि श्री संभव कुमार जी ने स्व-भाव और विभाव के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि आत्मा की वास्तविक सुरक्षा स्व-भाव में स्थित रहने से होती है। उन्होंने बताया कि क्षमा, विनम्रता, सरलता और निर्लोभता आत्मा के स्व-भाव के गुण हैं, जबकि क्रोध, अभिमान, कपट और लोभ जैसे भाव आत्मा के विभाव हैं, जो आत्म-हानि का कारण बनते हैं। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति इंद्रिय विषयों और बाहरी पदार्थों की ओर निरंतर आकर्षित रहता है, वह बहिर्मुखी हो जाता है, जबकि जो आत्मा में रमण करता है, वह अंतर्मुखी बनता है और यही अंतर्मुखता आत्मा की सच्ची सुरक्षा का मार्ग है।
कार्यक्रम का प्रारंभ तीर्थंकर शीतल प्रभु की स्तुति से हुआ। इसके बाद प्रेक्षाध्यान का प्रयोग कर उपस्थित साधकों को स्व-भाव में स्थित रहने का अभ्यास कराया गया। अंत में आत्म-जागरण के भावों से ओत-प्रोत गीत का मधुर संगान हुआ, जिसके साथ यह आध्यात्मिक सभा संपन्न हुई।
महाप्रज्ञ अंतरराष्ट्रीय विद्यालय के संबोधि सभागार में आयोजित यह कार्यक्रम आध्यात्मिक जागरण और आत्म-चिंतन का महत्वपूर्ण अवसर बना, जिसमें उपस्थित श्रद्धालुओं ने आत्मा की शुद्धि और संयम के संदेश को आत्मसात किया।


