अनासक्ति से निर्विकार बनता है जीवन, अहिंसा मुक्ति का पथ : मुनिश्री तत्त्व रुचि जी

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जयपुर : मालवीय नगर स्थित अणुविभा केन्द्र के महाप्रज्ञ सभागार में सोमवार को ‘निर्वेद’ (अनासक्ति) विषय पर आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि अनासक्ति की भावना व्यक्ति को विकारों से मुक्त करने का मार्ग प्रशस्त करती है। जब व्यक्ति विकारों से मुक्त होता है, तब उसके जीवन में हिंसा का स्थान नहीं रहता। अहिंसा ही बंधनों से मुक्ति का पथ है और कर्म के बंधनों से सर्वथा मुक्त व्यक्ति परम अवस्था को प्राप्त करता है।

वैराग्य भावना की व्याख्या करते हुए मुनिश्री ने कहा, “अनुस्रोत संसार का पथ है और प्रतिस्रोत संन्यास का मार्ग है। संत प्रतिस्रोतगामी होते हैं।” उन्होंने कहा कि संसार विकारों के प्रवाह में बह रहा है, जबकि संत जीवनभर निर्विकार रहने का प्रयास करता है। निर्विकार संत ही समाज और जगत के लिए आध्यात्मिक आधार बनते हैं।

मुनिश्री संभव कुमार जी ने कहा कि आसक्ति आध्यात्मिक साधना में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। स्वस्थ और संतुलित जीवन के लिए भी आसक्ति पर नियंत्रण आवश्यक है। उन्होंने 84 लाख जीव योनियों का सरल विवेचन करते हुए बताया कि जीव जन्म-मरण के चक्र में इन विभिन्न योनियों में भ्रमण करता रहता है।

प्रवचन के दौरान ‘पहला सुख निरोगी काया’ के संदर्भ में स्वास्थ्य एवं आत्मसंयम से जुड़े प्रेक्षाध्यान के प्रयोगों की जानकारी भी दी गई। ‘कामजयी’ मुद्रा के माध्यम से काम-वासना को नियंत्रित करने तथा ‘स्वप्ननाशक’ मुद्रा के माध्यम से बुरे स्वप्न, अनिद्रा और तनाव जैसी समस्याओं में लाभ की जानकारी दी गई।

कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर सुपार्श्व प्रभु की स्तुति से हुआ। इसके पश्चात साधकों को प्रेक्षाध्यान के विभिन्न प्रयोग कराए गए। दस प्रत्याख्यान तप एवं बारी के उपवास करने वाले साधकों को तपस्या का प्रत्याख्यान कराया गया। अंत में ‘भरत मुक्ति’ व्याख्यान का वाचन करते हुए साधु के उच्च एवं पवित्र आचार-विचार का उल्लेख किया गया।

मंगलपाठ के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। इस अवसर पर शहर महिला मंडल की अध्यक्षा श्रीमती कौशल्या जी जैन ने मंडल के तत्वावधान में मंगलवार को आयोजित होने वाले आयंबिल तप की सम्यक जानकारी उपस्थित श्रद्धालुओं को दी।