अरुण फरेरा की गिरफ्तारी पर बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणी, महाराष्ट्र सरकार को मुआवजे का निर्देश

0

डेस्क : बॉम्बे हाईकोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता अरुण फरेरा की वर्ष 2011 में हुई गिरफ्तारी को उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन मानते हुए महाराष्ट्र सरकार को दो लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी के दौरान निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए जाने के पर्याप्त प्रमाण रिकॉर्ड में नहीं मिले। यह मामला करीब 15 वर्ष पुराना है, जब जेल से रिहा होने के बाद फरेरा को दोबारा हिरासत में ले लिया गया था।

न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी फाल्के और न्यायमूर्ति राज डी. वाकोडे की पीठ ने माना कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया में संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन हुआ। अनुच्छेद 21 व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है, जबकि अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी और हिरासत के मामलों में कुछ महत्वपूर्ण कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है।

जेल से बाहर आते ही हिरासत में लिया

अरुण फरेरा को मई 2007 में कथित नक्सली संबंधों सहित विभिन्न मामलों में गिरफ्तार किया गया था। उनके खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत भी आरोप लगाए गए थे। इन मामलों में लगभग पांच वर्ष जेल में रहने के बाद सितंबर 2011 में उन्हें अंतिम मामले में भी बरी कर दिया गया और नागपुर केंद्रीय जेल से रिहा कर दिया गया।

फरेरा के अनुसार, जेल से बाहर आते ही सादे कपड़ों में आए कुछ लोगों ने उन्हें हिरासत में ले लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें न तो गिरफ्तारी का कारण बताया गया और न ही हिरासत में लेने वाले पुलिसकर्मियों ने अपनी पहचान स्पष्ट की। उनके परिवार और वकील को भी इस कार्रवाई की जानकारी नहीं दी गई।

गिरफ्तारी के रिकॉर्ड पर अदालत ने उठाए सवाल

फरेरा की ओर से अदालत में दलील दी गई कि उनकी गिरफ्तारी से संबंधित आवश्यक दस्तावेज और पुलिस रिकॉर्ड प्रक्रिया के पालन को प्रमाणित नहीं करते। उनके वकील ने यह भी कहा कि जिस समय उन्हें हिरासत में लिया गया, उस समय उनकी मां, भाई और वकील मौके पर मौजूद थे, लेकिन उन्हें गिरफ्तारी का कारण नहीं बताया गया।

पुलिस की ओर से तर्क दिया गया कि फरेरा को एक नक्सली समूह का वरिष्ठ सदस्य माना जाता था और उन्हें सुरक्षित तरीके से पुलिस थाने ले जाने के लिए विशेष सावधानी बरती गई थी। पुलिस ने यह भी दावा किया कि फरेरा ने कथित तौर पर वहां से भागने का प्रयास किया था।

हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि उपलब्ध गिरफ्तारी रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि फरेरा को हिरासत में लेने के कारणों की जानकारी दी गई थी। अदालत ने इसी आधार पर गिरफ्तारी की प्रक्रिया को गैरकानूनी माना।

आठ सप्ताह में मुआवजा देने का निर्देश

हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को अरुण फरेरा को दो लाख रुपये का मुआवजा आठ सप्ताह के भीतर देने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आर्थिक मुआवजा उनके साथ हुई परेशानी और पीड़ा की पूरी भरपाई नहीं कर सकता।

हालांकि, अदालत ने घटना के संबंध में शिकायत की जांच कराने की उनकी मांग स्वीकार नहीं की। साथ ही, यदि फरेरा मुआवजे की राशि से संतुष्ट नहीं होते हैं, तो उन्हें दीवानी मुकदमा दायर करने की स्वतंत्रता भी दी गई।

अदालत का यह फैसला गिरफ्तारी के दौरान संवैधानिक अधिकारों और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।