डेस्क : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में बढ़ते बाल विवाह के मामलों पर चिंता जताते हुए कहा है कि ऐसी घटनाओं में वृद्धि के लिए पुलिस की निष्क्रियता भी जिम्मेदार है। अदालत ने टिप्पणी की कि बाल विवाह निषेध अधिनियम के तहत कार्रवाई के स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद पुलिस दूल्हों और विवाह कराने में सहयोग करने वालों के खिलाफ मुकदमे दर्ज नहीं कर रही है।
न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता और न्यायमूर्ति अजय कुमार-द्वितीय की खंडपीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत के संज्ञान में ऐसा कोई मामला नहीं आया है, जिसमें बाल विवाह कराने वालों के विरुद्ध कानून की संबंधित धाराओं के तहत प्रभावी कार्रवाई की गई हो। अदालत ने कहा कि कानून का सही तरीके से पालन न होने के कारण बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई पर अंकुश नहीं लग पा रहा है।
हाईकोर्ट ने कहा कि बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के तहत केवल नाबालिग के विवाह को रोकना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसे विवाह में शामिल सभी जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जानी चाहिए। इसमें दूल्हा, विवाह कराने वाले तथा आयोजन में सहयोग करने वाले अन्य लोग भी शामिल हैं।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को निर्देश दिया कि राज्य के सभी पुलिस आयुक्तों, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों और पुलिस अधीक्षकों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जाएं। अदालत ने कहा कि बाल विवाह की सूचना मिलने पर संबंधित लोगों के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कर विधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि बाल विवाह केवल कानून का उल्लंघन नहीं है, बल्कि यह बच्चों के अधिकारों और उनके भविष्य पर गंभीर प्रभाव डालने वाली सामाजिक समस्या है। ऐसे मामलों में प्रशासन और पुलिस की जिम्मेदारी है कि वे कानून का सख्ती से पालन कराएं और दोषियों को दंडित करें।
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को राज्य में बाल विवाह के खिलाफ चल रहे प्रयासों को मजबूती देने वाला महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अदालत के निर्देशों के बाद पुलिस महकमे की भूमिका और जवाबदेही को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।


