डेस्क : डिजिटल भारत कार्यक्रम के 11 वर्ष पूरे होने पर संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन ने देश की डिजिटल उपलब्धियों को ऐतिहासिक परिवर्तन का उदाहरण बताया है। मिशन ने कहा कि पिछले एक दशक में भारत ने न केवल डिजिटल शासन और सेवा वितरण में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) का नेतृत्व भी स्थापित किया है।
2015 में शुरू हुए डिजिटल भारत कार्यक्रम ने देश में सरकारी सेवाओं, वित्तीय लेन-देन और दस्तावेज़ प्रबंधन प्रणाली को पूरी तरह बदल दिया है। सरकार के अनुसार, यह पहल अब दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक बन चुकी है।
यूपीआई बना वैश्विक भुगतान व्यवस्था का आधार
यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) ने भारत को डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व प्रदान किया है। वित्त वर्ष 2025–26 में यूपीआई के माध्यम से लगभग 24,000 करोड़ से अधिक लेन-देन दर्ज किए गए, जिससे यह दुनिया का सबसे बड़ा रीयल-टाइम डिजिटल भुगतान सिस्टम बन गया है।
यूपीआई की शुरुआत 2016 के बाद से अब तक इसमें अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है और यह प्रणाली अब कई देशों में भी अपनी सेवाएं दे रही है, जिससे भारत का डिजिटल भुगतान नेटवर्क वैश्विक स्तर पर विस्तार कर रहा है।
डिजिलॉकर ने दस्तावेज़ व्यवस्था को बनाया सरल
डिजिटल दस्तावेज़ संग्रह प्रणाली डिजिलॉकर ने नागरिकों के लिए सरकारी प्रमाणपत्रों और दस्तावेज़ों की पहुंच को आसान और सुरक्षित बनाया है। मार्च 2026 तक इस प्लेटफॉर्म पर 850 करोड़ से अधिक दस्तावेज़ डिजिटल रूप से संग्रहीत किए जा चुके हैं। इससे पहचान, सत्यापन और सरकारी सेवाओं के उपयोग की प्रक्रिया में तेज़ी आई है।
डिजिटल शासन और समावेशन में बड़ा बदलाव
डिजिटल भारत मिशन ने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में डिजिटल सेवाओं की पहुंच को व्यापक बनाया है। बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और सरकारी योजनाओं की डिलीवरी अब डिजिटल माध्यम से अधिक पारदर्शी और तेज़ हुई है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन ने इस प्रगति को “समावेशी विकास और तकनीकी नेतृत्व का वैश्विक मॉडल” बताया है और कहा है कि भारत का डिजिटल ढांचा अब कई देशों के लिए उदाहरण बन चुका है।


