लाडनूं : तेरापंथ की राजधानी लाडनूं की धरा पर योगक्षेम वर्ष का महामंगल प्रवास कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘भाव सत्य से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से विश्लेषित करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया कि भंते! भाव सत्य से जीव क्या प्राप्त करता है? तीन चीजे हैं- भाव सत्य, परम सत्य और योग सत्य। भाव सत्य से जीव भाव विशोधि को प्राप्त करता है। अनुमानित हो जाता है कि यहां कारण और कार्य का संबंध है। भाव सत्य कारण है और भाव विशोधि कार्य है।
भावों की निर्मलता और शुद्धता भाव सत्य के द्वारा प्राप्त होती है। तपस्या कारण है और निर्जरा उस तपस्या का कार्य है। भाव सत्य प्रयास का रूप है और भाव विशोधि निष्पत्तिपूर्ण रूप वाली उपलब्धि होती है। मनुष्य जीवन में पुरुषार्थ का बहुत महत्त्व है। एक ओर नियतिवाद है, भाग्यवाद है तो पुरुषार्थवाद भी है। भाग्यवाद, नियतिवाद भी एक सिद्धांत है तो पुरुषार्थवाद भी एक सिद्धांत है। भाग्यवाद और नियतिवाद को भी स्वीकार किया जा सकता है तो पुरुषार्थवाद भी एक सीमा तक करणीय होता है। भाग्यवाद ज्ञातव्य हो सकता है।
कोरे भाग्यवाद पर आलंबित नहीं रहना चाहिए और न ही कोरे पुरुषार्थ के भरोसे नहीं बैठा जा सकता है। जो अच्छा कवि होता है, उसे शब्दों की अपेक्षा भी होती है और उसके अच्छे भावार्थ की अपेक्षा भी होती है। भाग्यवाद को भी जाने और पुरुषार्थवाद को भी समझें। पुरुषार्थवाद अथवा कर्मवाद को एक ही माना जा सकता है। कर्मों के उदय की स्थिति को मूर्त भाग्यवाद और औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिक भाग्य अमूर्त भाग्य होते हैं। अवधि ज्ञान का होना जाना अमूर्त भाग्य का परिणाम होता है। प्रत्येक संसारी प्राणी के दोनों ही भाग्यवाद होते हैं।
कर्मों का फल तो भोगना ही होता है। कर्म फल के उदय के समय भी आदमी को समता-शांति रखने का प्रयास करना चाहिए, ताकि कर्मों का निर्जरण हो जाए। पूर्वकृत कर्मों के कारण भी दुःख और कष्ट आ जाता है। भाग्यवाद अपने चिंतन को अच्छा बनाने का निमित्त बन सकता है। जीवन में विपत्ति, कठिनाई का समय लगे तो ज्यादा धर्म और साधना का प्रयोग करने का प्रयास होना चाहिए। आदमी को यह ध्यान देना चाहिए कि समस्या और दुःख एक नहीं है। समस्या तो बड़े-बड़े लोगों के जीवन में आ सकती है। भाव सत्य को साधन के रूप में उपयोग करें तो भाव विशोधि की प्राप्ति हो सकती है। भाव सत्य का अभ्यास करने का प्रयास करना चाहिए। साधु-साध्वियों को तो प्रतिदिन एक माला नवकार मंत्र का जप करने का प्रयास करना चाहिए। इससे पांच प्रकार की प्रेरणाएं प्राप्त कर सकते हैं। नमस्कार महामंत्र को भी भाव सत्य के रूप में ले सकते हैं।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए। जैन विश्व भारती द्वारा मुनि जागृतकुमारजी द्वारा लिखित पुस्तक ‘आत्मिक इंटरनेट’ को आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित किया गया। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में बड़ी संख्या में बीदासरवासी उपस्थित थे। बीदासर की ओर से श्री बजरंग बोथरा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। बीदासर समाज ने गीत का संगान किया। बीदासर ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपनी प्रस्तुति दी।









