धर्म और व्यवहार से सम्पन्न व्यक्ति ही वास्तविक अर्थों में महान : मुनिश्री तत्त्व रुचि जी

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जयपुर : अणुविभा केन्द्र, मालवीय नगर में रविवार को आयोजित ‘व्यक्तित्व विकास कार्यशाला’ में मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने कहा कि संसार में महानता का आधार केवल धन, बल, ज्ञान, सत्ता अथवा रूप नहीं है, बल्कि धर्म और श्रेष्ठ व्यवहार ही व्यक्ति को वास्तविक अर्थों में बड़ा बनाते हैं।

प्रेरणादायी उद्बोधन में मुनिश्री ने कहा, “व्यवहार व्यक्तित्व का दर्पण है। व्यक्ति की पहचान उसके व्यवहार से होती है। उच्च विचार और उदात्त व्यवहार ही मानव की महानता का वास्तविक आधार हैं।” उन्होंने ठाणं सूत्र आगम के संदर्भ में व्यक्तित्व के चार प्रकारों की चर्चा करते हुए कहा कि ऐश्वर्य और भौतिक सम्पन्नता से अधिक महत्वपूर्ण व्यवहार में उन्नत और कुशल होना है।

मुनिश्री ने तत्त्वज्ञान की चर्चा करते हुए अट्ठारह पापों का विवेचन किया। ‘भरत मुक्ति’ गेय व्याख्यान के माध्यम से उन्होंने अभिभावकों के दायित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बच्चों में कर्तव्य-बोध जागृत करना माता-पिता का प्रथम और प्रमुख दायित्व है। संस्कारों और जिम्मेदारी की भावना से ही व्यक्तित्व का वास्तविक निर्माण होता है।

इस अवसर पर मुनिश्री संभव कुमार जी महाराज ने कहा कि मनुष्य सामान्यतः अपने अनुकूल लोगों के साथ सद्भावपूर्ण व्यवहार करता है, लेकिन वैरी, विरोधी अथवा प्रतिकूल व्यक्ति के प्रति दुर्भावना और दुर्व्यवहार करने लगता है। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक जीवन की कसौटी यही है कि प्रतिकूल परिस्थितियों और विरोधी व्यक्ति के साथ भी शालीनता एवं सद्भाव बनाए रखा जाए। “दुनिया में शिष्ट व्यवहार करने वाला ही विशिष्ट होता है।”

मुनिश्री ने बताया कि संतों के सान्निध्य में चल रही मौन एवं स्वाध्याय अट्ठाई तप साधना में श्रद्धालु उत्साहपूर्वक भाग ले रहे हैं। उन्होंने स्वाध्याय को उत्तम तप बताते हुए कहा कि इसके माध्यम से भी कर्मों की निर्जरा होती है। जो साधक उपवास अथवा अन्य व्रत नहीं कर सकते, वे स्वाध्याय के माध्यम से तप का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर मुनि सुव्रत स्वामी की स्तुति से हुआ। मुनिश्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को जप, तप और ध्यान के आध्यात्मिक प्रयोग भी करवाए। अंत में ‘विघ्न हरण-मंगल करण’ मंत्र के सामूहिक उच्चारण के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।