दोषों का वर्जन करने वाला साधु होता है सुव्रत : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण


लाडनूं : समूचा भारतवर्ष इस समय प्रचण्ड गर्मी का आतप झेल रहा है। भारत के कई शहरों का तापमान के मामले में अग्रणी बने हुए हैं। ऐसे में राजस्थान की रेतीली धरा पर जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी विशाल धवल सेना के साथ योगक्षेम वर्ष सुसम्पन्न कर रहे हैं। प्रचण्ड गर्मी में भी गुरुवाणी से प्रवाहित होने वाली ज्ञानगंगा की शीतलता को प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन श्रद्धालु बड़ी संख्या में उपस्थित हो रहे हैं। आचार्यश्री की छत्रछाया और अमृतमयी वाणी उन्हें आंतरिक शीतलता प्रदान करती है। इस योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत मंगल प्रवचन से पूर्व आचार्यश्री चतुर्विध धर्मसंघ को नित्य प्रति कुछ समय तक ध्यान का प्रयोग भी कराते हैं। यह अवसर ज्ञान के आराधकों व ध्यान-साधना में रुचि रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी बड़ा लाभदायक सिद्ध हो रहा है।

गुरुवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘सुव्रत रहो’ को व्याख्यायित करते हुए कहा कि पाप श्रमण के संदर्भ में अनेक बातें बताई गई हैं। जो साधु या व्यक्ति पाप श्रमण कहलाने वाले दोषों का सदा वर्जन करता है, वह मुनियों में सुव्रत होता है। दोषों को वर्जित रखने वाले साधु की इस लोक में पूजा की जाती है। वह साधु अमृत की तरह पूजित हो जाता है। व्रत, संन्यास, साधुत्व रूपी अमृत का पालन करने वाला मानों अमर बन जाता है। साधुत्व ऐसा अमृत है, जिसकी अच्छी तरह आराधना करने वाली आत्मा अमरत्व को प्राप्त हो जाती है। सुव्रत होना बहुत बड़ा अमृत प्राप्त करने के समान हो जाता है।

शास्त्र में महिमा बताई गई कि विशेष जागरूक साधु मुनियों में सुव्रत हो जाता है। संत समाज में भी उस मुनि की महिमा का मण्डन होने लगता है। मैं साधु हूं, ऐसी भावना भीतर में इतनी पुष्ट हो जाए कि रात्रि में स्वप्न भी आए तो साधुत्व का ही आए। जो साधु पांच महाव्रतों, पांच समितियों व तीन गुप्तियों को पालने वाला, साधना करने वाला होता है, वह सुव्रती बन जाता है। इस प्रकार सुव्रत बन जाना, बहुत अच्छी बात होती है।

ज्ञान अंधकार रूपी शत्रु को काटने वाली तलवार की भांति भी होती है। ज्ञान को अग्नि के रूप में भी देखा जा सकता है। ज्ञान रूपी अमृत समुद्र से नहीं निकलता, यह भीतर से प्राप्त होता है अथवा अपने सुगुरुओं से ग्रहण कर सकता है। ज्ञान एक अमृत है। साधु ज्ञान की आराधना करे, ऐसा प्रयास होना चाहिए। जितना संभव हो सके इस ज्ञानामृत को और अधिक बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए।

अनेकांत की दृष्टि से अज्ञानवाद को देखा जाए तो एक साधु जो विभिन्न विषयों का वेत्ता नहीं है, लेकिन समिति-गुप्तियों का अच्छा ज्ञान है और उनका अच्छा पालन भी करता है। ऐसा साधु भी बारहवें गुणस्थान तक पहुंच सकता है। आचार अच्छा पालने और कषाय मंद रखने वाला साधु कितना ऊंचा स्थान प्राप्त कर सकता है। आचार का, नियमों का, चारित्र का अच्छा पालन हो तो ज्यादा पांडित्य के बिना भी आत्मा का कल्याण हो सकता है। विनय करने वाले और आचार अच्छा पालने वाले साधु का भी कल्याण हो सकता है।

अच्छे ढंग से साधुपन पाल लेना और आत्मसाधना में लग जाना भी विशेष बात होती है। इस प्रकार सभी दोषों का परित्याग कर अपनी आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ जाने वाला साधु सुव्रत बन जाता है। सभी को सुव्रत बनने का प्रयास करना चाहिए।

आज से आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में मुमुक्षु बाइयों का एक सप्ताह तक प्रेक्षाध्यान शिविर का शुभारम्भ हो रहा था। इस संदर्भ में मुमुक्षु बहनें आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में उपस्थित थीं। आचार्यश्री ने उन्हें शिविर के संदर्भ में उपसंपदा प्रदान करते हुए विविध प्रेरणाएं प्रदान कीं।

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