22 साल पुराने मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर जताई नाराजगी

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 22 साल पुराने मारपीट के गंभीर मामले में आरोपियों के प्रति नरमी बरतने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले की कड़ी आलोचना की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि लंबे समय तक मुकदमा चलने के आधार पर आरोपियों को राहत देना पीड़ित के साथ अन्याय है। अदालत ने इसे ‘गलत सहानुभूति’ करार देते हुए दोनों आरोपियों को दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने की। यह मामला उत्तर प्रदेश के बहराइच में वर्ष 2003 में हुए एक गंभीर हमले से जुड़ा है। आरोप था कि दुकान को लेकर हुए विवाद के बाद दो लोगों ने एक व्यक्ति पर हमला किया था। इस हमले में पीड़ित को गंभीर चोटें आईं।

पीड़ित आज भी झेल रहा है दर्द

ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को पांच-पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें परिवीक्षा अधिनियम के तहत जेल भेजने के बजाय राहत दे दी थी। हाईकोर्ट ने मुकदमे की लंबी अवधि को भी राहत देने का आधार बनाया था।

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि आरोपी मुकदमे के दौरान जमानत पर थे और उन्होंने जेल में एक दिन भी नहीं बिताया। दूसरी ओर, हमले का शिकार हुआ व्यक्ति वर्षों से गंभीर शारीरिक परेशानियों का सामना कर रहा है और उसका इलाज भी जारी है।

न्याय के केंद्र में पीड़ित की पीड़ा भी जरूरी

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि मुकदमे में देरी निश्चित रूप से एक गंभीर समस्या है, लेकिन इसे आरोपियों को अनुचित राहत देने का आधार नहीं बनाया जा सकता। न्याय करते समय पीड़ित की स्थिति, उसकी चोटों और लंबे समय से झेली जा रही तकलीफों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत आरोपियों को परिवीक्षा का लाभ दिया गया था। साथ ही, दोनों को आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

इस फैसले से अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया में देरी के कारण पीड़ित के साथ हुए अन्याय और उसकी पीड़ा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।