डेस्क : राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव में मुकाबला सिर्फ भाजपा और कांग्रेस के बीच वोटों का नहीं है, बल्कि प्रत्याशियों की आर्थिक हैसियत भी सियासी चर्चा का बड़ा मुद्दा बन गई है। जयपुर समेत प्रदेश के सात प्रमुख शहरों में भाजपा और कांग्रेस के करीब हर चौथे प्रत्याशी की घोषित संपत्ति एक करोड़ रुपये या उससे अधिक है।
चुनावी हलफनामों के विश्लेषण के मुताबिक, सात शहरों में भाजपा और कांग्रेस के कुल 1,172 प्रत्याशियों में से 297 प्रत्याशी करोड़पति हैं। इनमें भाजपा के 175 और कांग्रेस के 122 उम्मीदवार शामिल हैं। यानी करोड़पति प्रत्याशियों की संख्या के मामले में भाजपा कांग्रेस से आगे है।
जयपुर में भाजपा का पलड़ा भारी
राजधानी जयपुर में दोनों प्रमुख दलों के 298 प्रत्याशियों में 97 करोड़पति हैं। इनमें भाजपा के 62 और कांग्रेस के 35 उम्मीदवार शामिल हैं। आंकड़े बताते हैं कि राजधानी के निकाय चुनाव में दोनों दलों ने बड़ी आर्थिक हैसियत वाले चेहरों पर भी भरोसा जताया है।
जयपुर में भाजपा प्रत्याशी सुनील कोठारी ने करीब 35 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्ति घोषित की है। वहीं, इसी चुनावी तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि कुछ प्रत्याशी बेहद सीमित आर्थिक संसाधनों के साथ मैदान में हैं।
सीकर में सबसे ज्यादा करोड़पति प्रत्याशी
करोड़पति उम्मीदवारों के अनुपात के मामले में सीकर सबसे आगे है। यहां भाजपा और कांग्रेस के 128 प्रत्याशियों में 47 करोड़पति हैं। यह कुल उम्मीदवारों का करीब 36 प्रतिशत है। इससे साफ है कि सीकर में भी दोनों प्रमुख दलों के बीच आर्थिक रूप से मजबूत उम्मीदवारों को लेकर प्रतिस्पर्धा दिखाई दे रही है।
जोधपुर में संपत्ति को लेकर भी चर्चा
जोधपुर में भाजपा और कांग्रेस के 200 प्रत्याशियों में 46 करोड़पति हैं। यहां पूर्व राजसिको अध्यक्ष मेघराज लोहिया ने करीब 67.15 करोड़ रुपये की संपत्ति घोषित की है। उनकी संपत्ति उन्हें इस चुनाव में सबसे अधिक संपत्ति घोषित करने वाले प्रमुख प्रत्याशियों में शामिल करती है।
चुनावी राजनीति में धनबल पर फिर बहस
निकाय चुनाव के इन आंकड़ों ने राजनीति में धनबल और चुनावी राजनीति को लेकर बहस को फिर तेज कर दिया है। सवाल यह है कि क्या स्थानीय निकाय चुनावों में राजनीतिक दल मजबूत आर्थिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता दे रहे हैं या करोड़ों की संपत्ति होने के बावजूद उम्मीदवारों की जीत पूरी तरह उनके स्थानीय प्रभाव और जनसंपर्क पर निर्भर करेगी।
हालांकि, करोड़पति होना चुनाव जीतने की गारंटी नहीं है। अंतिम फैसला मतदाताओं के हाथ में होगा और चुनाव परिणाम ही बताएंगे कि आर्थिक रूप से मजबूत उम्मीदवारों को जनता का कितना समर्थन मिला।








