जिनेवा में भारत का स्पष्ट संदेश : मानवाधिकारों पर चयनात्मक रवैया और दोहरे मानदंड नहीं चलेंगे

0

डेस्क  : संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) के 63वें सत्र में भारत ने सभी लोगों के अधिकारों और गरिमा की रक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए मानवाधिकारों के मामले में दोहरे मानदंड अपनाने पर सवाल उठाए। भारत के राजदूत और संयुक्त राष्ट्र में स्थायी प्रतिनिधि अरिंदम बागची ने कहा कि मानव जीवन का कोई भेदभावपूर्ण वर्गीकरण नहीं होना चाहिए और मानव गरिमा की रक्षा में किसी तरह का चयनात्मक रवैया नहीं अपनाया जाना चाहिए। उन्होंने आतंकवाद के पीड़ितों के मानवाधिकारों पर स्पष्ट ध्यान नहीं दिए जाने पर भी खेद जताया।

भारत के स्थायी मिशन के अनुसार, एक महीने तक चला परिषद का 63वां सत्र सात अक्टूबर को संपन्न हुआ। इस दौरान भारत ने विकास के अधिकार, जलवायु परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नस्लीय भेदभाव और विदेशों में रह रहे भारतीयों के अधिकारों सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपना पक्ष रखा।

बागची ने कहा कि मानवाधिकारों की रक्षा में दोहरे मानदंडों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। भारत ने विकास के अधिकार को लेकर भी अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की। भारतीय प्रतिनिधिमंडल के प्रथम सचिव अनुज स्वरूप ने सभी देशों से विकास के अधिकार पर प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय अभिसमय के मसौदे को जल्द अंतिम रूप देने का आग्रह किया।

वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार और विकासशील देशों की भागीदारी पर जोर देते हुए भारत ने कहा कि विकासशील देशों की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उचित महत्व मिलना चाहिए। भारतीय प्रतिनिधिमंडल के काउंसलर गौरव कुमार ठाकुर ने वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार, विकास सहयोग और विकासशील देशों की प्रभावी भागीदारी को भारत की प्रमुख प्राथमिकताएं बताया।

जलवायु परिवर्तन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर भी रखा पक्ष

जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भारत ने किसानों को जलवायु के अनुकूल बीज उपलब्ध कराने की आवश्यकता उठाई। साथ ही विकसित देशों से जलवायु वित्तपोषण को लेकर किए गए वादों को पूरा करने का आग्रह किया। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भारत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नई दिल्ली में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट में प्रस्तुत ‘मानव’ दृष्टिकोण को रेखांकित किया।

भारतीय प्रतिनिधिमंडल की प्रथम सचिव अनुपमा सिंह ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लोकतांत्रिक बनाना जरूरी है, ताकि इसका लाभ सभी तक पहुंचे और विशेष रूप से वैश्विक दक्षिण के देशों में समावेश तथा सशक्तीकरण को बढ़ावा मिले।

विदेशों में रह रहे भारतीयों के अधिकारों का मुद्दा उठाते हुए भारत ने वेतन का भुगतान नहीं किए जाने और पासपोर्ट जब्त करने जैसी समस्याओं से सुरक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत ने कहा कि प्रवासी भारतीयों के कल्याण की जिम्मेदारी उन देशों की है, जहां वे रह रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान को घेरा

मानवाधिकार परिषद में अपने जवाब के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए भारत ने जम्मू-कश्मीर का मुद्दा भी उठाया। भारतीय प्रतिनिधिमंडल के काउंसलर क्षितिज त्यागी ने दोहराया कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा।

उन्होंने 1990 में कश्मीरी पंडितों के पलायन का उल्लेख करते हुए इसके लिए पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को जिम्मेदार ठहराया। त्यागी ने कहा कि पाकिस्तान को दूसरे देशों के क्षेत्रों पर दावा करने और आतंकवाद को बढ़ावा देने के बजाय अपने लोगों के विकास पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि परिषद में इस तरह की बयानबाजी से पाकिस्तान की आर्थिक समस्याओं का समाधान नहीं होगा।

नस्लीय भेदभाव के खिलाफ समानता पर जोर

भारत ने नस्लीय भेदभाव के खिलाफ संघर्ष और समानता के सिद्धांतों को भी प्रमुखता से उठाया। भारतीय प्रतिनिधिमंडल के प्रथम सचिव एवं विधिक सलाहकार सुधीर केजे ने कहा कि महात्मा गांधी का समानता और गरिमा के लिए ऐतिहासिक संघर्ष नस्लीय भेदभाव के विरोध से जुड़ा था। उन्होंने इसे डरबन घोषणा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का महत्वपूर्ण आधार बताया।

भारत ने मानवाधिकार परिषद में तकनीकी सहयोग और सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा से संबंधित संयुक्त राष्ट्र कोषों में अपने योगदान का भी उल्लेख किया। सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा के तहत संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों के मानवाधिकार रिकॉर्ड की समीक्षा की जाती है।

सत्र के समापन पर बागची ने कहा कि भारत ने पूरे सत्र के दौरान रचनात्मक संवाद और सहयोग की भावना के साथ भागीदारी की। उन्होंने कहा कि भारत की यह भूमिका वर्ष के पहले हुए परिषद के सत्रों में भी लगातार बनी रही।