डेस्क : अमेरिका में एच-1बी वीजा पर काम करने वाले विदेशी पेशेवरों को लेकर ट्रंप प्रशासन ने सख्त रुख अपना लिया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने एच-1बी वीजा धारकों की तुलना ‘बंधुआ मजदूरों’ से करते हुए आरोप लगाया कि कुछ कंपनियां कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त कर अमेरिकी नागरिकों के रोजगार और वेतन को प्रभावित कर रही हैं। इस बीच, अमेरिकी प्रशासन ने आठ बड़ी कंपनियों को ग्रीन कार्ड से जुड़ी स्थायी श्रम प्रमाणन प्रक्रिया से निलंबित करने की घोषणा की है। इस कार्रवाई से बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवरों के प्रभावित होने की आशंका है।
अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरियां छिनने का आरोप
जेडी वेंस ने कहा कि कुछ कंपनियां एच-1बी वीजा कार्यक्रम का इस्तेमाल अमेरिकी कर्मचारियों की जगह कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए कर रही हैं। उनके मुताबिक, इससे अमेरिकी नागरिकों के रोजगार के अवसरों और वेतन पर असर पड़ रहा है।
वेंस ने दावा किया कि एच-1बी वीजा पर काम करने वाले कर्मचारी समान पदों पर कार्यरत अमेरिकी नागरिकों की तुलना में सालाना करीब 20 हजार डॉलर कम कमा रहे हैं। वहीं, विदेशी आउटसोर्सिंग कंपनियों के माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों के मामले में वेतन का यह अंतर 48 हजार डॉलर तक हो सकता है। उन्होंने कंपनियों पर आरोप लगाया कि वे कम लागत वाले विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त कर मुनाफा बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं।
आठ कंपनियों पर कार्रवाई
अमेरिकी प्रशासन ने कॉग्निजेंट, इन्फोसिस, टाटा, विप्रो, एचसीएल, कैपजेमिनी, माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी को स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम यानी पीईआरएम से निलंबित करने की घोषणा की है। इस प्रक्रिया के माध्यम से कंपनियां पात्र विदेशी कर्मचारियों के लिए रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड प्रायोजित कर सकती हैं।
अमेरिकी श्रम विभाग का आरोप है कि कुछ कंपनियों ने विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति से जुड़े नियमों का दुरुपयोग किया है। प्रशासन का कहना है कि वह अमेरिकी नागरिकों के रोजगार और वेतन की सुरक्षा के लिए ऐसे मामलों की जांच कर रहा है। निलंबन के चलते संबंधित कंपनियों के नए और लंबित पीईआरएम आवेदनों पर भी असर पड़ सकता है।
माइक्रोसॉफ्ट पर भी सख्ती
वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि कंपनी को अमेरिकी कर्मचारियों को प्राथमिकता देनी चाहिए। प्रशासन ने कंपनी की विदेशी कर्मचारियों को ग्रीन कार्ड के लिए प्रायोजित करने की क्षमता पर भी रोक लगाने की घोषणा की है।
हालांकि, इन कदमों का अर्थ यह नहीं है कि एच-1बी वीजा कार्यक्रम पूरी तरह बंद कर दिया गया है या सभी मौजूदा वीजा रद्द कर दिए गए हैं। पीईआरएम प्रक्रिया पर रोक मुख्य रूप से संबंधित कंपनियों के माध्यम से स्थायी निवास हासिल करने के रास्ते को प्रभावित करती है।
भारतीय पेशेवरों पर क्यों पड़ेगा असर?
अमेरिका के एच-1बी वीजा कार्यक्रम में भारतीय पेशेवरों की बड़ी हिस्सेदारी है। अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024 में स्वीकृत एच-1बी याचिकाओं के लाभार्थियों में भारत में जन्मे लोगों की हिस्सेदारी लगभग 71 प्रतिशत थी।
ऐसे में अमेरिकी प्रशासन की सख्ती का असर भारतीय आईटी पेशेवरों और अमेरिका में काम करने की योजना बना रहे युवाओं पर पड़ सकता है। खासकर उन कर्मचारियों के लिए स्थायी निवास की प्रक्रिया जटिल हो सकती है, जिनकी ग्रीन कार्ड याचिका संबंधित कंपनियों के माध्यम से आगे बढ़ रही है।
अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि वीजा व्यवस्था का उद्देश्य देश में आवश्यक विशेषज्ञता लाना होना चाहिए, न कि स्थानीय कर्मचारियों को कम वेतन वाले विदेशी कर्मचारियों से बदलना। दूसरी ओर, इस तरह की सख्ती से विदेशी पेशेवरों के रोजगार और भविष्य की योजनाओं को लेकर अनिश्चितता बढ़ सकती है।








