डेस्क : जमीयत उलमा-ए-हिंद (एएम गुट) के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने मंगलवार को कहा कि देश में जिन मस्जिदों को गिराया जा रहा है, वे एक दिन फिर आबाद होंगी और वहां अजान की आवाज गूंजेगी। उन्होंने कहा कि इस्लाम को ताकत के बल पर खत्म नहीं किया जा सकता और सत्ता में बैठे लोग हमेशा सत्ता में नहीं रहेंगे।
दारुल उलूम देवबंद परिसर में आयोजित राब्ता-ए-मदारिस इस्लामिया के सम्मेलन को संबोधित करते हुए मौलाना मदनी ने देश में कथित रूप से बढ़ती सांप्रदायिकता और मस्जिदों, मदरसों तथा अन्य धार्मिक संस्थानों को निशाना बनाए जाने पर चिंता जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा परिस्थितियों में मुसलमानों के साथ-साथ उनकी धार्मिक पहचान, संस्कृति और संस्थानों को भी निशाना बनाया जा रहा है।
मदनी ने कहा कि सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन इस्लाम को पहले भी कोई ताकत समाप्त नहीं कर सकी और भविष्य में भी ऐसा संभव नहीं है। उन्होंने मुसलमानों से मौजूदा परिस्थितियों में निराश होने के बजाय धैर्य, साहस और दृढ़ता बनाए रखने की अपील की।
पांच हजार मदरसों के प्रतिनिधियों ने लिया हिस्सा
सम्मेलन में देशभर के करीब पांच हजार मदरसों के प्रतिनिधि शामिल हुए। अपने संबोधन में मौलाना मदनी ने पूर्व सोवियत संघ का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां लंबे समय तक धार्मिक गतिविधियों और इस्लाम के प्रतीकों को दबाने की कोशिश की गई, लेकिन इसके बावजूद मुसलमानों की आस्था समाप्त नहीं हुई। उन्होंने कहा कि सोवियत संघ के विघटन के बाद स्वतंत्र हुए कई देशों में आज मस्जिदें आबाद हैं और अजान दी जाती है।
धार्मिक आस्था के साथ चरित्र निर्माण पर जोर
मौलाना मदनी ने कहा कि उनका धार्मिक विश्वास है कि एक बार मस्जिद बन जाने के बाद उसकी इमारत गिरा दिए जाने से उसकी मजहबी हैसियत समाप्त नहीं होती। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को कठिन परिस्थितियों का सामना धैर्य और हौसले के साथ करना चाहिए।
उन्होंने नई पीढ़ी की धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा पर जोर देते हुए कहा कि बच्चों के चरित्र निर्माण और उनमें अच्छे संस्कार विकसित करने की जिम्मेदारी केवल मदरसों की नहीं, बल्कि माता-पिता की भी है। मदरसों को धार्मिक शिक्षा के साथ विद्यार्थियों के नैतिक विकास और वैचारिक प्रशिक्षण पर भी ध्यान देना चाहिए।
मदरसों के योगदान का किया उल्लेख
मदनी ने मदरसों के खिलाफ चलाए जा रहे कथित नकारात्मक अभियान की आलोचना करते हुए कहा कि इन संस्थानों ने देश की आजादी, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सुधार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने दारुल उलूम देवबंद के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान और इसके विद्वानों की कुर्बानियों का भी उल्लेख किया।
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने मुस्लिम समुदाय से एकता बनाए रखने, धार्मिक एवं शैक्षिक संस्थानों को मजबूत करने और नई पीढ़ी की बेहतर परवरिश पर विशेष ध्यान देने की अपील की।









