जेजू द्वीप : विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत और दक्षिण कोरिया के बीच सहयोग को और गहरा करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच “जहाजों से लेकर चिप्स तक” कई क्षेत्रों में मजबूत परस्पर पूरकता मौजूद है, जो एक अधिक स्थिर और सहयोगी वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में योगदान दे सकती है।
दक्षिण कोरिया की अपनी दो दिवसीय यात्रा (24-25 जून) के दौरान जेजू फोरम फॉर पीस एंड प्रॉस्पेरिटी 2026 में मुख्य भाषण देते हुए उन्होंने कहा कि आज की दुनिया “खंडित होती व्यवस्था” की ओर बढ़ रही है, लेकिन इसके भीतर सहयोग के नए अवसर भी छिपे हैं।
उन्होंने कहा कि मंच पर जिस विषय पर चर्चा हो रही है—एक विभाजित विश्व की समस्या और सहयोग के नए रास्ते—उससे वह सहमत हैं। उनके अनुसार, “खंडन की प्रवृत्ति अब वास्तविकता है और यह पूरी तरह नकारात्मक भी नहीं है, क्योंकि इससे किसी एक शक्ति का दबदबा कम होता है और अधिक देशों को अवसर मिलता है।”
जयशंकर ने कहा कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता आर्थिक एकीकरण और परस्पर निर्भरता है, जिसमें आपूर्ति श्रृंखलाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि संसाधनों और तकनीक तक फैली हुई है।
उन्होंने यह भी कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीकें सीमाओं से परे जाकर वैश्विक एकीकरण को और तेज करेंगी, क्योंकि डेटा और मॉडल का उपयोग स्वाभाविक रूप से अंतरराष्ट्रीय स्वरूप लेता है।
हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि महामारी, आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियाँ किसी एक देश की सीमा में सीमित नहीं रह सकतीं, इसलिए इनके समाधान के लिए वैश्विक सहयोग अनिवार्य है।
भारत की सभ्यतागत परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि “वसुधैव कुटुंबकम” की सोच आज भी वैश्विक दृष्टि को दिशा देती है।
जयशंकर ने यह भी कहा कि आज के समय में आर्थिक प्रतिस्पर्धा पर रणनीतिक गणनाओं का प्रभाव बढ़ गया है, जिससे वैश्विक संपर्क और आपूर्ति व्यवस्था भी प्रभावित हो रही है। उन्होंने विकासशील देशों के औद्योगीकरण के अधिकार पर भी चिंता जताते हुए कहा कि कई देशों को बाजार पहुंच और प्रतिस्पर्धा से जुड़े प्रतिबंधों के कारण अवसरों से वंचित किया जा रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि आज की दुनिया में हर चीज़ का “हथियारकरण” बढ़ रहा है और सोशल मीडिया युग में राजनीतिक निर्णय अधिक जोखिम-आधारित होते जा रहे हैं, जिससे व्यापक समाज की लागत पर कम ध्यान दिया जा रहा है।
इस स्थिति से निपटने के लिए उन्होंने वैश्विक सहयोग को और मजबूत करने की आवश्यकता बताई।
जयशंकर ने वैश्विक सहयोग को पुनर्परिभाषित करने के लिए पांच प्रमुख सुझाव भी रखे—वैश्विक अर्थव्यवस्था का “डी-रिस्किंग”, उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखलाओं का विविधीकरण, प्रभावशाली देशों के बीच नए सहयोग ढांचे, अंतरराष्ट्रीय कानूनों और समुद्री संधियों का संरक्षण, ग्लोबल साउथ को अधिक अवसर देना और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार।
भारत-दक्षिण कोरिया संबंधों पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच “जहाजों से लेकर चिप्स तक”, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और रक्षा जैसे क्षेत्रों में गहरी संभावनाएँ हैं, जिन्हें और आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि हाल ही में सियोल में हुई द्विपक्षीय बैठकों में आर्थिक, तकनीकी, रणनीतिक सहयोग और जन-जन के बीच संबंधों को और मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया गया है।


