डेस्क : कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने देश में हालिया राजनीतिक घटनाक्रम और उपचुनावों के नतीजों को कांग्रेस के लिए सकारात्मक संकेत बताया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियां सत्तारूढ़ दल के लिए एक बड़ा झटका हैं और उसे अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने की जरूरत है।
जेन-जी और जेन-अल्फा के साथ आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की बातचीत पर प्रतिक्रिया देते हुए थरूर ने कहा कि हाल के घटनाक्रमों ने राजनीतिक माहौल को बदलने का संकेत दिया है। उन्होंने कथित ‘कॉकरोच आंदोलन’, एक मंत्री के इस्तीफे और जल्दबाजी में पारित किए गए एक विधेयक का भी उल्लेख किया।
थरूर ने हाल में हुए दो उपचुनावों को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि एक सीट पर प्रशांत किशोर की पार्टी ने भाजपा के मजबूत गढ़ को अपने कब्जे में लिया है। यह सीट भाजपा लंबे समय से जीतती आ रही थी और पार्टी यहां लगातार कई चुनावों में सफल रही थी। इसके अलावा कांग्रेस ने मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा।
कांग्रेस सांसद ने कहा कि दोनों उपचुनाव हिंदी पट्टी के राज्यों में हुए हैं और इनके नतीजों को व्यापक राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जाना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि आने वाले समय में कांग्रेस के पास बेहतर प्रदर्शन करने का अवसर है।
थरूर ने कहा कि भारतीय चुनाव व्यवस्था की खासियत यह है कि अलग-अलग राज्यों में चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले साल मार्च में होने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के पास जीत हासिल करने की पर्याप्त क्षमता है।
युवाओं की शिकायतें जायज : मोहन भागवत
इसी बीच आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने मुंबई में जेन-जी और जेन-अल्फा के करीब दो हजार युवाओं के साथ संवाद किया। यह कार्यक्रम ‘इंडियाज इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशन्स’ के 15वें वर्षगांठ समारोह के दौरान आयोजित किया गया था।
भागवत ने युवाओं से बातचीत के दौरान कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन संवाद का एक वैध माध्यम है। उन्होंने कहा कि विरोध का उद्देश्य समाज में विभाजन पैदा करना नहीं, बल्कि अलग-अलग विचारों के बीच चर्चा के जरिए सहमति बनाने का होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जब लोगों की चिंताओं का समाधान बातचीत के माध्यम से नहीं हो पाता, तब आंदोलन की स्थिति पैदा हो सकती है। भागवत ने जेन-जी की शिकायतों को जायज बताते हुए कहा कि उन्हें युवाओं की ईमानदारी पर भरोसा है।
शिक्षा के मुद्दे पर भी भागवत ने चिंता जताई और शिक्षा पर सरकारी खर्च को सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के छह प्रतिशत तक बढ़ाने की वकालत की।








