लाडनूं : जैन श्वेतांबर तेरापंथ की राजधानी लाडनूं की धरा पर अपनी विशाल धवल सेना के साथ योगक्षेम वर्ष का महामंगल प्रवास कर रहे तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में निरंतर जप, तप, ध्यान, योग, साधना का सागर लहरा रहा है, जिसका चतुर्विध धर्मसंघ खूब लाभ प्राप्त कर रहा है। शनिवार को ही महातपस्वी आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में एक साथ तेरह चारित्रात्माओं ने मासखमण तप का प्रत्याख्यान किया, जो मानों अपने आप में कीर्तिमान स्थापित करने वाला रहा। आचार्यश्री ने उन सभी चारित्रात्माओं को रविवार को सुबह पारणा प्रदान कर मंगल आशीर्वाद भी प्रदान किया। आचार्यश्री द्वारा नियमित रूप से आगम के आधार पर दिया जाने वाला मंगल प्रवचन भी सभी के लिए उपयोगी सिद्ध हो रहा है।
सोमवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया कि प्रायश्चित्त करने से जीव क्या प्राप्त करता है ? उतर प्रदान करते हुए बताया गया कि धार्मिक साधना के साथ प्रायश्चित्त की विधा गहराई से जुड़ी हुई है। जहां आचार का विधान है, वहां आचार के विधान के अतिक्रमण हो जाने पर प्रायश्चित्त भी बताया गया है। जिस प्रकार नियम संहिता होती है, उसी प्रकार मर्यादाओं के साथ दंड व प्रायश्चित्त संहिता का होना आवश्यक है। बड़े दोषों की शुद्धि के लिए गुरु या आचार्य के पास जाकर आलोयणा ली जाती है, जबकि सामान्य दोषों की आलोयना अग्रणी संतों के पास भी ली जा सकती है।
प्रायश्चित्त दोष और अतिचार की विशुद्धि का उपाय है। तप और जीव के संयोग से प्रायश्चित्त बनता है। दूसरा अर्थ—जो पाप का छेदन करे, वह प्रायश्चित्त है। प्रायश्चित्त करने से जीव पाप कर्म की विशुद्धि कर लेता है और निर्दोष हो जाता है। जैसे वस्त्र पर लगा दाग धोने से वह बेदाग हो जाता है, वैसे ही चारित्र पर लगा दोष-रूपी धब्बा प्रायश्चित्त व तप से शुद्ध हो जाता है। प्रायश्चित्त करने से जीव पाप कर्म की विशुद्धि कर लेता है और निरतिचार हो जाता है। अपनी गलती को बिना छिपाए बालवत् सरलता और ऋजुता से गुरु के समक्ष प्रकट कर देना। यह शुद्धि का मुख्य आधार है। अधिकृत प्रायश्चित्त दाता (गुरु आदि) जो भी तप, स्वाध्याय या दंड निर्देशित करें, उसे सहर्ष स्वीकार करना। निर्देशित प्रायश्चित्त का पूरी निष्ठा से पालन व निर्वहन करना। सम्यक् प्रायश्चित्त से सम्यक्त्व और ज्ञान की विशुद्धि होती है।
दोष सेवन से आचार की विराधना होती है, लेकिन प्रायश्चित्त लेने से विराधना समाप्त होकर आचार की ‘आराधना’ हो जाती है। आचार की आराधना से आचार-फल अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
चारित्रात्माओं एवं श्रावक-श्राविकाओं के लिए दोनों समय का प्रतिक्रमण और यथासमय प्रायश्चित्त अत्यंत आवश्यक है। यदि दोषों की आलोचना और प्रायश्चित्त न लिया जाए, तो आगे की गति व भव में अनुकूलता नहीं रहती और कर्मों का कटु फल भोगना पड़ता है। इसलिए जीवन में आराधक बने रहने के लिए समय पर आलोचना और प्रायश्चित्त अवश्य कर लेना चाहिए। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए।








