सरलता सिद्धि का मार्ग, साधना का प्रवेश द्वार : मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’

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जयपुर : अणुविभा केन्द्र, मालवीय नगर में सोमवार को आयोजित धर्मसभा में मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने सरलता और ऋजुता को आध्यात्मिक जीवन की महत्वपूर्ण आधारशिला बताते हुए कहा कि “सरलता सिद्धि का मार्ग है और सरलता साधना का प्रवेश द्वार है।”

आचार्य तुलसी की कृति ‘भरत मुक्ति’ पर प्रवचन करते हुए मुनिश्री ने प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव जी की माता भगवती मरुदेवा के जीवन का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि माता मरुदेवा का जीव वनस्पति काय से सीधे मनुष्य गति में आया और बिना किसी विशेष धर्मोपासना के परम तत्त्व को प्राप्त कर सिद्धत्व तक पहुंचा। इसके पीछे उनके जीव की सहज आंतरिक निर्मलता, हृदय की सरलता और प्रकृति की कोमलता प्रमुख कारण रहे।

मुनिश्री तत्त्व रुचि जी ‘तरुण’ ने श्रद्धालुओं से जीवन में सरलता और निष्कपटता अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि सरल रहकर ही जीवन में वास्तविक सफलता प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने ईसा मसीह से जुड़े प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वर्ग का अधिकारी वही है, जिसके भीतर बालक जैसी निष्कपटता और सरलता हो। इसलिए सरलता केवल व्यवहार का गुण नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति का मार्ग भी है।

इस अवसर पर मुनिश्री संभव कुमार जी ने कहा कि धर्म साधना में सरलता पहली शर्त है। सरलता के अभाव में की गई धर्माराधना अपेक्षित फल नहीं देती। संतों को सरलता का आदर्श बताते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार सर्प बिल में प्रवेश करते समय अपने शरीर को सीधा कर लेता है, उसी प्रकार साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए मनुष्य को भी अपने भीतर की वक्रताओं को छोड़कर सरल बनना आवश्यक है। सरल भाव से आत्मशुद्धि भी होती है और सिद्धि का मार्ग भी प्रशस्त होता है।

कार्यक्रम का शुभारंभ तीर्थंकर संभव प्रभु की भक्ति गीत से हुआ। इसके बाद तनाव मुक्ति और स्मरण शक्ति के लिए प्रेक्षाध्यान के विभिन्न प्रयोग करवाए गए। अंत में मंगल संगान के साथ धर्मसभा का समापन हुआ।